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बोधघाट डैम का फिर विरोध: 56 गांवों के आदिवासी बोले- पहले हमें गोली मारो, फिर परियोजना बनाना

रायपुर/दंतेवाड़ा। बस्तर की 47 साल पुरानी बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर एक बार फिर विरोध तेज हो गया है।

राज्य सरकार द्वारा परियोजना के लिए सर्वे शुरू किए जाने की चर्चाओं के बीच रविवार को दंतेवाड़ा जिले के हितालकूडूम गांव में बड़ी महाबैठक आयोजित की गई। इसमें 18 पंचायतों के 56 गांवों से हजारों आदिवासी शामिल हुए और परियोजना का पुरजोर विरोध किया।

बैठक में ग्रामीणों ने कहा कि बोधघाट डैम केवल जमीन और घरों को ही नहीं डुबोएगा, बल्कि उनकी आस्था, संस्कृति और परंपराओं को भी खत्म कर देगा।

आदिवासियों का कहना है कि उनके देवी-देवता पेड़, पहाड़, गुफाओं और प्राकृतिक स्थलों में निवास करते हैं। यदि डैम बना तो ये सभी धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल जलमग्न हो जाएंगे, जिसकी भरपाई किसी भी मुआवजे से संभव नहीं है।

ग्रामीणों ने चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार यदि परियोजना को आगे बढ़ाना चाहती है तो पहले उन्हें गोली मार दे, क्योंकि वे अपने जल, जंगल, जमीन और अस्तित्व से समझौता नहीं करेंगे। उनका दावा है कि बोधघाट परियोजना बनने से बस्तर का बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा और हजारों लोगों का विस्थापन होगा।

गौरतलब है कि हितालकूडूम वही गांव है, जहां वर्ष 1979 में इस परियोजना की शुरुआत की गई थी। लगातार विरोध के चलते करीब पांच दशक बाद भी यह परियोजना धरातल पर नहीं उतर सकी है।

महाबैठक में भाजपा का कोई नेता शामिल नहीं हुआ, जबकि कांग्रेस के कई वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधि पहुंचे। बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने कहा कि कांग्रेस प्रभावित ग्रामीणों के साथ खड़ी है और उनकी आवाज रायपुर से लेकर दिल्ली तक उठाई जाएगी।

संघर्ष समिति का दावा है कि प्रस्तावित परियोजना से दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर और नारायणपुर जिलों के 56 गांव प्रभावित होंगे।

वहीं सरकार का कहना है कि बोधघाट परियोजना से सिंचाई, बिजली उत्पादन और क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलेगी। हालांकि फिलहाल परियोजना को लेकर आदिवासियों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है।

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