छत्तीसगढ़ के किसान का दावा: रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पूर्वजों की, सुप्रीम कोर्ट में ₹3500 करोड़ मुआवजे की मांग

रायपुर। रायपुर के 53 वर्षीय किसान अश्विनी बांधे ने दावा किया है कि स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन जिस जमीन पर बने हैं, वह उनके पूर्वजों की है। इस दावे को लेकर वे पिछले 35 वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर करीब 3500 करोड़ रुपए मुआवजे की मांग की है। मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है और सुप्रीम कोर्ट ने अभी उनके दावे पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है।
बांधे के अनुसार, वर्ष 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ के तहत माना क्षेत्र की करीब 30 एकड़ 18 डिसमिल जमीन अस्थायी रूप से सैन्य जरूरतों के लिए अधिग्रहित की थी। उनका कहना है कि युद्ध समाप्त होने के बाद यह जमीन वापस की जानी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके पास मौजूद दस्तावेजों में जमीन के बदले 1300 रुपए वार्षिक किराया देने का भी उल्लेख है, जो परिवार को कभी नहीं मिला।
किसान का दावा है कि उन्होंने पिछले तीन दशकों में देशभर के रिकॉर्ड रूम, पुस्तकालयों और सरकारी कार्यालयों से ऐतिहासिक दस्तावेज जुटाए हैं। हाल ही में संस्कृति विभाग की प्रदर्शनी से भी उन्हें कई महत्वपूर्ण अभिलेख मिले, जिनकी प्रमाणित प्रतियां उन्होंने प्राप्त कर सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत की हैं। उनका कहना है कि बकाया किराया, ब्याज और अन्य कानूनी दावों को जोड़कर उन्होंने 3500 करोड़ रुपए का क्लेम किया है।
वर्ष 2026 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले की दोबारा जांच के निर्देश दिए थे, जबकि बांधे का कहना है कि सक्षम अधिकारी पहले ही जांच कर चुके हैं। उनका यह भी दावा है कि एयरपोर्ट के अलावा नवा रायपुर की कुछ अन्य जमीनों को लेकर भी ऐसे ही विवाद मौजूद हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसान के सभी दावे अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। संबंधित सरकारी विभागों का विस्तृत पक्ष अभी सामने आना बाकी है और इस पूरे विवाद पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।



