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बंगाल वोटर लिस्ट रिवीज़न: भाषा और वक्त की जंग में फंसे अधिकारी; 48 लाख फाइलों का बोझ, बाहरी अफसरों को ‘उपनाम’ समझने में मुश्किल

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की ‘तार्किक विसंगतियों’ को दूर करने के लिए चल रही विशेष सत्यापन प्रक्रिया (SIR) अब अधिकारियों के लिए गले की फांस बन गई है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हो रही इस जांच में 60 लाख संदिग्ध दस्तावेजों का निपटारा होना है, लेकिन समय की कमी और भाषा की दीवार ने न्यायिक अधिकारियों को भारी दबाव में डाल दिया है।

750 अधिकारी, पर काम का पहाड़

इस महा-अभियान में पश्चिम बंगाल के 550 न्यायिक अधिकारियों के साथ पड़ोसी राज्य ओडिशा और झारखंड के 200 अधिकारियों को लगाया गया है।

  • दबाव: एक अधिकारी ने बताया कि उन्हें रोजाना औसतन 300 फाइलों का निपटारा करना पड़ रहा है।
  • बड़ा आंकड़ा: अब भी करीब 48 लाख लोगों के दस्तावेजों की जांच लंबित है। जिस रफ्तार से काम हो रहा है, उससे तय समय सीमा में काम पूरा होना नामुमकिन लग रहा है।

भाषा का पेंच: बनर्जी और बंधोपाध्याय का उलझाव

जांच में सबसे बड़ी बाधा ‘बांग्ला उपनाम’ बने हुए हैं। अंग्रेजी में जिसे ‘बनर्जी’ लिखा जाता है, बांग्ला में वह ‘बंधोपाध्याय’ हो जाता है। इसी तरह चटर्जी-चट्टोपाध्याय और मुखर्जी-मुखोपाध्याय के बीच का अंतर बाहरी राज्यों (ओडिशा-झारखंड) के अधिकारी नहीं समझ पा रहे हैं।

  • विसंगति: अनुवाद के दौरान हुए इस फर्क को सिस्टम ‘तार्किक विसंगति’ मान रहा है, जबकि ये वैध वोटर हैं। बांग्ला भाषा की समझ न होने के कारण बाहरी अधिकारियों को हर दस्तावेज के लिए स्थानीय मदद लेनी पड़ रही है।

राजनीतिक भविष्य पर खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर जांच पूरी नहीं हुई, तो बड़ी संख्या में लोग वोट देने से वंचित रह जाएंगे।

  • TMC को डर: सबसे ज्यादा चिंता सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को है, क्योंकि विसंगति वाली सूची में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक वोटर शामिल हैं, जो पार्टी का मुख्य वोट बैंक माना जाता है।
  • आंकड़े: नवंबर से अब तक करीब 63 लाख नाम हटाए जा चुके हैं, जिससे मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इन न्यायिक अधिकारियों के फैसले अंतिम होंगे, लेकिन नामांकन की अंतिम तारीख तक इस प्रक्रिया को पूरा करना आयोग के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

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