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मल्हनिया जलाशय में 54 केज से बदली मछुआरों की जिंदगी: 44 परिवारों को मिला रोजगार का आधार

PM मत्स्य संपदा योजना से आधुनिक केज कल्चर शुरू; सालाना 10-15 लाख रुपए की मछली बिक्री, सदस्यों की आय भी बढ़ी

रायपुर। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत आधुनिक तकनीक से मछली पालन को बढ़ावा देने का असर अब गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है। गौरेला विकासखंड के देवरगांव स्थित मल्हनिया जलाशय में 54 केज स्थापित किए गए हैं। इससे जय बूढ़ा देव मल्हनिया आदिवासी मछुआ सहकारी समिति के 44 सदस्यों को रोजगार और आय का नया आधार मिला है।

समिति में 26 सदस्य विशेष पिछड़ी जनजाति (पीवीटीजी) बैगा समुदाय से हैं। पहले सदस्य मुख्य रूप से जलाशय में पारंपरिक तरीके से मछली पकड़कर परिवार चलाते थे। लीज और अन्य खर्चों के बाद समिति की वार्षिक आय करीब 2.5 से 3 लाख रुपए तक सीमित थी। इसके बाद मत्स्य पालन विभाग और जिला प्रशासन ने आधुनिक केज कल्चर को बढ़ावा दिया।

54 केज में आधुनिक तरीके से मछली पालन

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और जिला खनिज न्यास निधि (डीएमएफटी) के सहयोग से मल्हनिया जलाशय में कुल 54 केज लगाए गए। इनमें उन्नत प्रजातियों की मछलियों का पालन किया जा रहा है। पारंपरिक अनुभव के साथ आधुनिक तकनीक जुड़ने से उत्पादन और बाजार के अवसर बढ़े हैं।

केज कल्चर शुरू होने के बाद समिति ने एक वर्ष में करीब 10 से 15 लाख रुपए की मछली बिक्री की है। वर्तमान में केजों में करीब 10 से 15 टन मछली उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है।

हर महीने 6-7 हजार रुपए की आय

केज कल्चर से समिति के सदस्यों को नियमित रोजगार के साथ अतिरिक्त आय भी मिल रही है। सदस्यों के अनुसार उन्हें प्रतिमाह करीब 6 से 7 हजार रुपए तक की आय प्राप्त हो रही है। इससे परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में मदद मिल रही है और पारंपरिक मत्स्याखेट पर निर्भरता कम हुई है।

मल्हनिया जलाशय में केज कल्चर ने पारंपरिक मछुआरों के अनुभव को आधुनिक तकनीक से जोड़कर आजीविका का नया मॉडल तैयार किया है। खासतौर पर बैगा समुदाय की भागीदारी से यह पहल ग्रामीण स्तर पर रोजगार और आय के अवसर बढ़ाने का माध्यम बनी है।

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