जहां लगती थी माओवादियों की जन अदालत, अब वहां लोकतंत्र की पंचायत; शीर्ष नक्सली पापाराव के गांव पहुंचे SP-कलेक्टर

सुकमा। बस्तर के जंगलों में बदलाव की एक ऐसी बयार बह रही है, जो कुछ साल पहले तक नामुमकिन मानी जाती थी।
सुकमा जिला मुख्यालय से करीब 90 किमी दूर, घोर नक्सल प्रभावित इलाके नीलामड़गू में आज बंदूक की गूंज नहीं, बल्कि विकास की चर्चा हो रही है।
यह गांव शीर्ष माओवादी नेता पापाराव का गृहग्राम है, जहां कभी माओवादियों की खूंखार ‘जन अदालत’ लगती थी, वहां अब सुकमा कलेक्टर अमित कुमार और एसपी किरण चव्हाण ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर उनकी समस्याएं सुन रहे हैं।
दहशत के साए से बाहर आता नीलामड़गू
नीलामड़गू और आसपास के इलाके पिछले चार दशकों से माओवादी हिंसा की भेंट चढ़े हुए थे। हालात ऐसे थे कि बिना नक्सलियों की इजाजत के यहां एक ईंट भी नहीं रखी जा सकती थी।
साल 2012 में जिला मुख्यालय के पास से ही तत्कालीन कलेक्टर का अपहरण कर लिया गया था, लेकिन आज सुरक्षा बलों के बढ़ते प्रभाव और नए कैंपों की स्थापना ने प्रशासन की राह आसान कर दी है।
विकास की नई इबारत
- बदलाव की गवाही: गांव के बुजुर्ग विज्जा कहते हैं कि पहले यहां दिनदहाड़े वर्दीधारी नक्सली आते थे, लेकिन अब अधिकारी आकर राशन, सड़क और बिजली की बात करते हैं।
- शिक्षा और रोजगार: युवा रामेश्वर बताते हैं कि नक्सलियों के स्कूलों में जहां हिंसा सिखाई जाती थी, अब वहां सरकारी स्कूलों के माध्यम से शिक्षा और नौकरियों की जानकारी मिल रही है।
- प्रशासनिक प्राथमिकता: कलेक्टर अमित कुमार के अनुसार, इन इलाकों में ‘विश्वास’ बहाली सबसे बड़ी चुनौती थी। अब सड़क, स्वास्थ्य और पेयजल सुविधाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
बाइक से पहुंच रहे अधिकारी
सिर्फ सुकमा ही नहीं, दंतेवाड़ा के सुदूर गांव पुरंगेल में भी कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव बाइक से पहुंचे।
उन्होंने वहां सड़क निर्माण और आजीविका मिशन के तहत बकरी व सूअर पालन से ग्रामीणों को जोड़ने के निर्देश दिए। यह तस्वीरें इस बात का प्रमाण हैं कि बस्तर के दुर्गम इलाकों में अब माओवाद का किला ढह रहा है और लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हो रही हैं।





