कंपनियों की आपराधिक जिम्मेदारी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: आरोपी कर्मचारी का नाम नहीं होने पर भी चलेगा केस

दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों की आपराधिक जिम्मेदारी को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ इस वजह से किसी कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खत्म नहीं की जा सकती कि अपराध करने वाले कर्मचारी या अधिकारी की पहचान नहीं हुई या उसे आरोपी नहीं बनाया गया। यदि चार्जशीट में पहली नजर में कंपनी की अपराध में भूमिका सामने आती है, तो उसके खिलाफ मुकदमा जारी रह सकता है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह फैसला सनोफी इंडिया लिमिटेड की अपील पर सुनाया। कंपनी ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही खत्म करने से इनकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की अपील खारिज कर दी।
BARC के लिए महंगी दवाएं खरीदने का आरोप
मामला BARC के लिए दवाओं की खरीद से जुड़े CBI केस का है। चार्जशीट में आरोप था कि BARC के एक अधिकारी ने सनोफी इंडिया के साथ मिलकर महंगी दरों पर दवाएं खरीदीं और कंपनी को अनुचित फायदा पहुंचाने के बदले रिश्वत ली।
कंपनी की दलील थी कि अपराध के लिए मेंस रिया यानी आपराधिक मंशा जरूरी है। कंपनी की अपनी कोई मानवीय मानसिकता नहीं होती और उसे जेल की सजा भी नहीं दी जा सकती। इसलिए उसके खिलाफ कार्यवाही खत्म होनी चाहिए।
व्यक्ति का नाम नहीं तो भी कंपनी पर केस संभव
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी या अधिकारी को आरोपी नहीं बनाया जाना अपने आप में कंपनी के खिलाफ केस खत्म करने का आधार नहीं है। शुरुआती चरण में आसपास के तथ्यों और परिस्थितियों से कंपनी की आपराधिक मंशा का आकलन किया जा सकता है। संबंधित व्यक्ति की भूमिका और उसकी पहचान ट्रायल के दौरान तय की जा सकती है।
कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट में यह पहली नजर में दिखना चाहिए कि कंपनी ने अपराध किया या उसमें उसकी भूमिका रही। इसके लिए हर मामले में उस व्यक्ति का नाम बताना जरूरी नहीं है, जिसने कंपनी की ओर से संबंधित काम किया।
कंपनी की जिम्मेदारी तय करने के लिए 3 चरण
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए तीन चरण बताए। पहले कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन से यह देखा जाएगा कि कंपनी की ओर से निर्णय लेने का अधिकार किसे था। दूसरे चरण में संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता देखी जाएगी। जरूरत पड़ने पर तीसरे चरण में कानून के उद्देश्य और नीति के आधार पर विशेष आरोपण नियम तय किए जा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि कॉर्पोरेट आपराधिक जिम्मेदारी जटिल कानूनी विषय है और भविष्य में इस क्षेत्र में कानून की समीक्षा की जरूरत हो सकती है।





