पॉक्सो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की 10 साल की सजा, पीड़िता से शादी और समझौते को माना विशेष परिस्थिति

नई दिल्ली। एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की 10 साल की सजा रद्द कर दी है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए यह निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा कि मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
मामला वर्ष 2018 का है, जब पीड़िता नाबालिग थी और आरोपी के साथ उसके प्रेम संबंध थे। इसी दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध बनने के बाद आरोपी के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज हुआ। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2019 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी।
बाद में पीड़िता की शादी किसी अन्य व्यक्ति से हुई, लेकिन उसके पुराने संबंधों की जानकारी मिलने के बाद पति ने उसे छोड़ दिया। इसके बाद जमानत पर बाहर आए आरोपी और पीड़िता के बीच फिर संपर्क हुआ। दोनों ने आपसी सहमति से संबंध सुधार लिए और वर्ष 2024 में विवाह कर लिया। आरोपी ने पीड़िता को 10 लाख रुपये का मुआवजा भी दिया।
शादी के बाद पीड़िता ने स्वयं अदालत से अपने पति की सजा समाप्त करने का अनुरोध किया था। हालांकि मद्रास हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि दोनों अब पति-पत्नी के रूप में शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ऐसे में मामले की असाधारण परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दोषसिद्धि और सजा को रद्द करना उचित होगा।
हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला मामले की विशिष्ट परिस्थितियों पर आधारित है और इसे पॉक्सो कानून के सामान्य मामलों के लिए मिसाल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।





