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झीरम घाटी हमले में 10 दोषियों को फांसी: 13 साल बाद आया फैसला, 27 लोगों की हुई थी मौत

रायपुर। झीरम घाटी नक्सली हमले के करीब 13 साल बाद जगदलपुर की एनआईए अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। 2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर हुए हमले के मामले में कोर्ट ने 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। दोषियों में 8 पुरुष और 2 महिलाएं शामिल हैं। हालांकि, सजा हाईकोर्ट की पुष्टि के बाद ही लागू होगी। दोषियों को फिलहाल केंद्रीय जेल जगदलपुर में रखा गया है और उन्हें 30 दिन के भीतर हाईकोर्ट में अपील करने का अधिकार है।

25 मई 2013 को हुआ था हमला

25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा सुकमा से लौट रही थी। दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में माओवादियों ने काफिले को निशाना बनाया। पहले आईईडी विस्फोट किया गया, फिर सड़क पर पेड़ गिराकर रास्ता रोका और जंगल से फायरिंग की गई। हमले में तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 27 लोगों की मौत हुई थी।

करीब 13 साल चली सुनवाई के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और दस्तावेज पेश किए गए। अभियोजन ने दोषियों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी, जबकि बचाव पक्ष ने सजा कम करने की दलील दी।

10 दोषियों के नाम

कोर्ट ने प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमित्रा पुनेम, मोडियम मुक्का, मंडवी कोसा कवासी उर्फ कोसाराम, आयाता मरकाम, मड़ाकामी देवा, जोगा मड़ाकामी, बंजामी सन्ना उर्फ चामरू और महादेव नाग को दोषी माना है।

फैसले के बाद उठे कई सवाल

मामले में कई आरोपी अब भी फरार बताए जा रहे हैं। जांच में कुछ बड़े माओवादी नेताओं के नाम भी सामने आए थे। इसी वजह से यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ट्रायल में दोषी ठहराए गए 10 आरोपियों तक ही हमले की पूरी साजिश सीमित थी या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क था।

झीरम हमले की न्यायिक जांच आयोग की करीब 4,184 पेज की रिपोर्ट भी अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है। ऐसे में हमले की पूरी साजिश, सुरक्षा व्यवस्था में चूक और अन्य आरोपियों की भूमिका को लेकर बहस जारी है। वहीं अभियोजन पक्ष का कहना है कि कोर्ट ने उपलब्ध दस्तावेज और गवाहों के आधार पर दोष सिद्ध होने के बाद सजा सुनाई है।

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