बस्तर दशहरा: मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र जगदलपुर रवाना, 800 साल पुरानी परंपरा का होगा निर्वहन

दंतेवाड़ा। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए मां दंतेश्वरी की पावन डोली और राजछत्र रविवार को दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना हुए। शारदीय नवरात्र की अष्टमी पर मां को विदाई देने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। गाजे-बाजे, पारंपरिक वाद्ययंत्रों, लोकनृत्य और जयकारों के बीच पूरा दंतेवाड़ा भक्तिमय नजर आया। मंदिर के मुख्य द्वार पर पुलिस बल ने सलामी देकर मां को सम्मान दिया।
मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र का बस्तर दशहरा में शामिल होना यहां की सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का अहम हिस्सा है। दंतेवाड़ा से जगदलपुर तक की इस यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है। विदाई के दौरान भक्तों ने मां के जयकारे लगाए और सुख-समृद्धि की कामना की।
बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में शामिल मावली परघाव की परंपरा करीब 800 वर्षों से निभाई जा रही है। इस रस्म में दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी की डोली जगदलपुर पहुंचती है, जहां मावली माता से उनका पारंपरिक मिलन होता है। यह आयोजन बस्तर की आदिवासी आस्था, राजपरंपरा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
दंतेवाड़ा से रवाना हुई डोली निर्धारित पूजा स्थलों पर रुकते हुए जगदलपुर पहुंचेगी। वहां बस्तर दशहरा के अंतर्गत विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक रस्में पूरी की जाएंगी। इस दौरान मां दंतेश्वरी की उपस्थिति को दशहरा उत्सव की धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व दिया जाता है।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, मां दंतेश्वरी की डोली और राजछत्र 27 अक्टूबर को वापस दंतेवाड़ा के लिए रवाना होंगे। इस यात्रा के साथ बस्तर की ऐतिहासिक विरासत, लोकआस्था और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं एक बार फिर जीवंत होंगी।





