भारत-यूएई के बीच समुद्र के नीचे तेल पाइपलाइन की तैयारी, 88% कच्चा तेल आयात करता है भारत

दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव के बीच भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक रास्तों पर काम कर रहा है। इसी कड़ी में भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच समुद्र के नीचे तेल और गैस पाइपलाइन बिछाने की संभावना पर काम शुरू किया गया है। प्रस्तावित पाइपलाइन ओमान और यूएई के तट से शुरू होकर अरब सागर के नीचे से गुजरते हुए भारत के गुजरात और महाराष्ट्र तट तक पहुंच सकती है।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने 28 सितंबर को यूएई के विदेश व्यापार मंत्री थानी बिन अहमद अल जेउदी से मुलाकात की थी। इसके बाद ओमान-यूएई से भारत तक समुद्र के नीचे पाइपलाइन परियोजना को प्राथमिकता देने की जानकारी सामने आई है।
पहले गैस पाइपलाइन की थी योजना
इस परियोजना को MEIDP यानी मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन के नाम से प्रस्तावित किया गया है। शुरुआत में परियोजना के तहत समुद्र के रास्ते केवल गैस पहुंचाने की योजना पर विचार किया जा रहा था। अब कच्चे तेल के परिवहन की संभावना को भी इसमें शामिल किया जा रहा है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के निर्देश पर सरकारी कंपनियां परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही हैं। इसमें समुद्र की गहराई में पाइपलाइन बिछाने की तकनीक, परियोजना की लागत, सुरक्षा, संचालन और व्यावहारिकता जैसे पहलुओं का अध्ययन किया जाएगा। तकनीकी अध्ययन के बाद ही परियोजना की क्षमता और अंतिम मार्ग को लेकर तस्वीर साफ होगी।
होर्मुज संकट के बीच वैकल्पिक रास्ते की जरूरत
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88% हिस्सा आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने या समुद्री मार्ग बाधित होने का असर देश की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। इसी वजह से सरकार आयात के लिए वैकल्पिक बुनियादी ढांचे पर जोर दे रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। पश्चिम एशिया से आने वाले कच्चे तेल के अलावा LPG और LNG की आपूर्ति भी इस क्षेत्र से होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आने वाली आधी से अधिक LPG और LNG कतर और यूएई से इसी समुद्री मार्ग के जरिए जहाजों से पहुंचती है।
गुजरात-महाराष्ट्र तट तक पहुंचने की संभावना
प्रस्तावित पाइपलाइन अरब सागर के नीचे से होकर भारत के पश्चिमी तट तक पहुंच सकती है। गुजरात और महाराष्ट्र को संभावित लैंडिंग प्वाइंट के तौर पर देखा जा रहा है। इससे समुद्री जहाजों पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक अतिरिक्त विकल्प तैयार करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, यह अभी अध्ययन और योजना के स्तर पर है। पाइपलाइन की वास्तविक क्षमता, लागत, मार्ग और निर्माण समय जैसी जानकारियां तकनीकी एवं आर्थिक अध्ययन पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होंगी।





