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मोरपल्ली में बदलती तस्वीर: कभी बारूद और भय का केंद्र था गांव, अब विकास की चौपाल तक पहुंच रहा प्रशासन

सुकमा। नदी-नालों, कच्ची पगडंडियों और घने जंगलों के बीच बसा सुकमा का मोरपल्ली गांव अब धीरे-धीरे उस अंधेरे दौर से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है।

वर्ष 2011 के चर्चित ताड़मेटला-मोरपल्ली-तिम्मापुरम आगजनी कांड के बाद यह इलाका लंबे समय तक देशभर में चर्चा में रहा था। घटना के बाद गांव और बाहरी दुनिया के बीच दूरी बढ़ गई थी।

प्रशासनिक पहुंच सीमित थी और सुरक्षा कारणों से यहां पहुंचना भी चुनौती माना जाता था। लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं।

गुरुवार को कलेक्टर अमित कुमार और जिला पंचायत सीईओ मुकुंद ठाकुर मोटरसाइकिल से मोरपल्ली पहुंचे। उनका यह दौरा केवल सरकारी निरीक्षण नहीं था, बल्कि बदलते बस्तर की नई तस्वीर भी पेश कर रहा था।

गांव में आयोजित चौपाल में ग्रामीणों ने राशन, पेयजल, स्कूल, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं अधिकारियों के सामने रखीं।

बच्चों से शिक्षा को लेकर चर्चा की गई और महिलाओं को सरकारी योजनाओं तथा जरूरी दस्तावेजों की जानकारी दी गई।

प्रशासन ने ग्रामीणों की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए कई विकास कार्यों के निर्देश दिए।

इसमें खराब सोलर संयंत्रों की मरम्मत, बोर खनन, तालाब गहरीकरण, लंबित मानदेय भुगतान, पीडीएस व्यवस्था मजबूत करने और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार जैसे कार्य शामिल हैं।

सुरपनगुड़ा में साप्ताहिक बाजार शुरू करने और पेद्दाबोड़केल में खाद्यान्न भंडारण व्यवस्था शुरू करने की दिशा में भी पहल की जा रही है।

मार्च 2011 में हुए आगजनी कांड में मोरपल्ली समेत आसपास के गांवों के सैकड़ों मकान प्रभावित हुए थे।

मामले की जांच सीबीआई तक पहुंची थी। जांच रिपोर्ट में ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुरम में बड़ी संख्या में घरों के जलने का उल्लेख किया गया था।

इस घटना ने पूरे क्षेत्र के सामाजिक और प्रशासनिक जीवन को प्रभावित किया।

लंबे समय तक अलग-थलग रहे मोरपल्ली में अब विकास, संवाद और भरोसे की नई शुरुआत दिखाई दे रही है।

प्रशासन और ग्रामीणों के बीच बढ़ती बातचीत इस बात का संकेत है कि बस्तर के संवेदनशील इलाकों में बदलाव की प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।

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