श्रम विभाग में डायरेक्टर पद की पदोन्नति हाईकोर्ट ने रद्द की

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने श्रम विभाग में डायरेक्टर पद पर की गई पदोन्नतियों को नियम विरुद्ध मानते हुए निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) ने पदोन्नति प्रक्रिया के दौरान निर्धारित नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया।
मामले में रायपुर निवासी रज्जू कुमार भोई ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि डायरेक्टर पद पर पदोन्नति के लिए अधिकारियों के 10 वर्षों के गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) का मूल्यांकन जरूरी था।
लेकिन डीपीसी ने केवल 5 साल की गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर चयन प्रक्रिया पूरी कर दी। इसे छत्तीसगढ़ श्रम सेवा नियम 2013 और छत्तीसगढ़ लोक सेवा पदोन्नति नियम 2003 के खिलाफ बताया गया।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकलपीठ ने की। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मेरिट-कम-सीनियरिटी के आधार पर होने वाली पदोन्नति में केवल वरिष्ठता देखना पर्याप्त नहीं है। अधिकारियों की योग्यता, कार्य क्षमता और तुलनात्मक मूल्यांकन भी जरूरी होता है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई कनिष्ठ अधिकारी अधिक योग्य पाया जाता है, तो उसे वरिष्ठ अधिकारी से पहले पदोन्नति दी जा सकती है। कोर्ट ने माना कि डीपीसी ने अधिकारियों की योग्यता का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया और नियमों के अनुसार उनका वर्गीकरण भी नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने 24 फरवरी 2025 को जारी पदोन्नति आदेश को निरस्त करते हुए राज्य सरकार को 7 फरवरी 2025 की डीपीसी बैठक की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही नई रिव्यू डीपीसी गठित कर तीन महीने के भीतर पूरी प्रक्रिया दोबारा पूरी करने को कहा है। इस फैसले को प्रशासनिक पदोन्नति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और नियमों के पालन के लिहाज से अहम माना जा रहा है।





