देवपुर वन क्षेत्र में औषधीय वनस्पतियों की पहचान पर कार्यशाला, 80 से अधिक प्रजातियों की दी गई जानकारी

रायपुर। बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के वनमंडल बलौदाबाजार अंतर्गत देवपुर परिक्षेत्र में औषधीय वनस्पतियों की पहचान और उनके महत्व को लेकर एक दिवसीय बॉटनाइजेशन कार्यशाला का आयोजन किया गया।
वन मंत्री केदार कश्यप के निर्देश और प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख अरुण कुमार पांडेय के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यशाला में वन विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों, वैद्यों, वन प्रबंधन समिति के सदस्यों और विद्यार्थियों ने भाग लिया।
कार्यशाला का उद्देश्य वन क्षेत्रों में पाए जाने वाले औषधीय पौधों की पहचान, उनके संरक्षण और उपयोगिता के संबंध में लोगों को जागरूक करना था। विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को पौधों की पहचान करने की तकनीक बताई। इसमें छाल, पत्ती, तना, जड़, फल और फूल के आधार पर विभिन्न वनस्पतियों का वर्गीकरण करने की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम के दौरान अर्जुन, आंवला, बहेड़ा, बेल, काली मुसली, हाथीपांव, दूधी, भुईनीम, सतावर, खरहर, ठेलका, नरनारी और गरुड़ सहित 80 से अधिक औषधीय वनस्पति प्रजातियों की पहचान कराई गई। विशेषज्ञों ने बताया कि इन पौधों का पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में महत्वपूर्ण स्थान है। इनके विभिन्न भागों का उपयोग कई प्रकार के रोगों के उपचार में किया जाता है।
कार्यशाला में औषधीय पौधों के पर्यावरणीय महत्व, संरक्षण की आवश्यकता और प्रकृति आधारित जीवनशैली पर भी चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने कहा कि जंगलों में मौजूद वनस्पतियां न केवल जैव विविधता को बनाए रखने में सहायक हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी संसाधन उपलब्ध कराती हैं।
इस अवसर पर वनमंडल बलौदाबाजार, वनमंडल कवर्धा और उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे। पारंपरिक वनौषधीय ज्ञान रखने वाले वैद्यगण, बारनवापारा क्षेत्र के गाइड्स और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भी कार्यशाला में सक्रिय भागीदारी निभाई।
वनमंडल अधिकारी बलौदाबाजार धम्मशील गणवीर ने कहा कि कार्यशाला का उद्देश्य केवल औषधीय ज्ञान का प्रसार करना नहीं, बल्कि समाज को वनस्पतियों के महत्व से जोड़ना और पर्यावरण संरक्षण में जनभागीदारी बढ़ाना भी है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय से वन संपदा का बेहतर संरक्षण किया जा सकता है।





