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NDA: 6 साल और इन 19 पार्टियों ने छोड़ा NDA का साथ, जानिए 2014 से 2020 तक किन सहयोगी पार्टियों ने किया किनारा

नई दिल्ली। (NDA) 2014 से लेकर 2020 तक कई सहयोगी पार्टियों ने एनडीए का साथ छोड़ दिया। 6 सालों के सियासी दौर पर एक नजर डाले तो 19 सहयोगी पार्टियों ने एनडीए का साथ छोड़ दिया। जिसके बाद एनडीए का कुनबा लगातार सिमटते जा रहा है। हाल ही में किसान बिल पर मोदी सरकार के रवैये से नाराज होकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) ने भी एनडीए से किनारा कर लिया है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को राजस्थान में भाजपा का मजबूत सहयोगी माना जाता रहा है।(NDA)  आरएलपी के अध्यक्ष हनुमान प्रसाद बेनीवाल किसान बिल पर केंद्र सरकार के निर्णय से काफी नाराज हैं। पिछले चार महीने के दौरान चार सियासी दलों में एनडीए छोड़कर भाजपा को गहरा झटका दिया है।

सभी सहयोगी पार्टियों की अलग-अलग नाराजगी है। किसी ने एनआरसी को लेकर नाराजगी जाहिर की तो किसी ने कृषि कानून बिल का विरोध किया। लेकिन इतने पार्टियों का एनडीए का साथ छोड़ना बीजेपी के लिए किसी झटके से कम नहीं है।

1998 में हुआ था एनडीए का गठन

(NDA) पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने 1998 में एनडीए के गठन का फैसला किया था। उस समय प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाले अकाली दल, बाल ठाकरे की शिवसेना, जॉर्ज फर्नांडिस की समता पार्टी और जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक ने सबसे पहले एनडीए को ज्वाइन किया था। मगर पिछले छह वर्षों के दौरान एनडीए छोड़ने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

भाजपा को सबसे पहले 2014 में हरियाणा जनहित कांग्रेस ने झटका दिया था। लोकसभा चुनाव के कुछ महीने बाद ही कुलदीप बिश्नोई ने एनडीए से अलग होने का ऐलान कर दिया था। वहीं 2014 में आंध्र प्रदेश में जनसेना भी भाजपा का साथ छोड़ दी।

2016 में  तीन अन्य पार्टियों ने छोड़ा साथ

कुछ ही समय बाद तमिलनाडु की एमडीएमके पार्टी ने भी भाजपा पर तमिल हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाते हुए एनडीए से अलग रास्ता चुन लिया था। 2016 में तमिलनाडु की दो अन्य पार्टियों डीएमडीके और पीएमके ने भी एनडीए से दूरी बना ली थी। 2016 के दौरान केरल रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने भी भाजपा का साथ छोड़ दिया था।

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2017 में इन पार्टियों ने दिया बीजेपी को झटका

तीन साल पहले 2017 में महाराष्ट्र में स्वाभिमान पक्ष ने एनडीए से अलग हो गई थी। इस पार्टी ने मोदी सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाया था। इसके तुरंत बाद बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री जीत राम मांझी की पार्टी में हम ने भी एनडीए से किनारा कर लिया। यहीं ही नहीं नागालैं की नगा पीपुल्स फ्रंट ने भी एनडीए का साथ छोड़ दिया। मगर विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी हम और वीआईपी फिर से एनडीए में वापस लौट आई।

2018 में एनडीए को लगा तगड़ा झटका

एनडीए को सबसे बड़ा झटका तेलुगू देशम, शिवसेना और अकाली दल के साथ छोड़ने से लगा है। आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा ना देने से नाराज चल रहे पूर्व मुख्यमंत्री और तेलुगू देशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए का साथ छोड़ दिया।  

विधानसभा चुनाव के दौरान एनडीए की साथी शिवसेना ने छोड़ा साथ

1998 से एनडीए की सहयोगी रही शिवसेना ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी का साथ छोड़ दिया। दोनों ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव साथ लड़ा था। लेकिन शिवसेना मुख्यमंत्री के पद पर मुखिया उद्धव ठाकरे को बैठाना चाहती थी। मगर बीजेपी को यह नापंसद था। और बीजेपी देवेद्र फंडणवीस को ही सीएम के रूप में देखना चाहती थी। इसे लेकर दोनों दलों के बीच में कुछ दिनों तक चली खीचतान के बाद शिवसेना ने कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर लिया। और मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हो गए।

भाजपा को लगा सबसे बड़ा झटका

सितंबर के महीने में अकाली दल ने एनडीएम से दूरी बना ली। क्यों कि अकाली दल तीनों कृषि बिल को लेकर नाराज चल रही थी। इसी समय अकाली दल की प्रतिनिधि हरिसिमरत कौर ने केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल एनडीए से अलग होने के बाद लगातार मोदी सरकार पर हमला करने में जुटे हैं और उन्होंने मोदी सरकार को किसान विरोधी बताया है। उनका कहना है कि हमें कृषि बिलों की वापसी से कम कुछ भी मंजूर नहीं है।

एनडीए की सहयोगी रही इन पार्टियों ने भी दिया झटका

पश्चिम बंगाल में भाजपा के सहयोगी रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने भी एनडीए से किनारा कर लिया है। कर्नाटक में प्रज्ञान वथा पार्टी ने भी एनडीए से अलग राह चुन ली है। इन दोनों के अलावा बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की अगुवाई वाली आरएलएसपी और उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर की अगुवाई वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने भी एनडीए को झटका दिया है। उधर जम्मू-कश्मीर में मुफ्ती की पार्टी पीडीपी से भाजपा खुद ही अलग हो गई है। भाजपा के अलग हो जाने के कारण जम्मू-कश्मीर में महबूबा सरकार भी गिर गई थी।

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