बस्तर दशहरा: नवाखाई की शर्त पूरी होने पर राजा को लौटाया विजय रथ

रूठे ग्रामीणों को मनाने राजसी ठाठ-बाट से पहुंचे कमलचंद्र भंजदेव; 55 गांवों के माड़िया समुदाय की अहम भूमिका, विदेशों से भी पहुंचे पर्यटक
जगदलपुर। बस्तर दशहरे के तहत बाहर रैनी की परंपरा निभाई गई। नवाखाई की शर्त पूरी होने के बाद कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपाकर रखा गया आठ पहियों वाला विजय रथ राज परिवार को लौटा दिया गया।
ग्रामीणों ने राजा कमलचंद्र भंजदेव को नए चावल और देसी गाय के दूध से बनी खीर खिलाई। इसके बाद रस्सियों के सहारे विजय रथ को खींचकर राजमहल तक पहुंचाया गया। इस परंपरा को देखने हजारों लोग जुटे। डेनमार्क और फ्रांस से आए पर्यटक भी रस्म के साक्षी बने।
नवाखाई की रस्म के बाद वापस मिला रथ
परंपरा के मुताबिक, बुधवार देर रात ग्रामीण राजमहल के सामने से विजय रथ ले जाकर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा आए थे। रथ वापस पाने के लिए राज परिवार के सदस्य को ग्रामीणों के साथ नवाखाई की रस्म निभानी होती है।
शुक्रवार को कमलचंद्र भंजदेव ने नए चावल से बनी खीर खाकर यह परंपरा पूरी की। इसके बाद ग्रामीणों ने रथ लौटाने की रस्म निभाई। देवी-देवताओं की पूजा की गई और मां दंतेश्वरी को भोग अर्पित किया गया।
राजा को प्रतीकात्मक सजा देने की परंपरा
बस्तर दशहरे की भीतर रैनी और बाहर रैनी रस्मों में ग्रामीणों की अहम भूमिका होती है। भीतर रैनी के दौरान ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से राजा को सजा देते हुए विजय रथ अपने कब्जे में ले लेते हैं। इसके बाद राजा को राजसी ठाठ-बाट के साथ गांव बुलाया जाता है। ग्रामीणों के साथ नवाखाई खाने के बाद ही रथ वापस मिलता है।
करीब 618 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा में किलेपाल, बास्तानार सहित 55 गांवों के माड़िया समुदाय की प्रमुख भूमिका है। इस बार भी कमलचंद्र भंजदेव घोड़े वाले रथ के साथ कुम्हड़ाकोट पहुंचे।
आतिशबाजी के बीच राजमहल पहुंचा विजय रथ
जंगल से वापसी के दौरान आतिशबाजी के बीच राज परिवार और विजय रथ का स्वागत किया गया। सैकड़ों ग्रामीणों ने मिलकर दो मंजिला रथ को राजमहल तक खींचा। रथ की ऊंचाई के कारण शहर में प्रवेश के दौरान हाईटेंशन तारों से सुरक्षा के लिए कुछ समय बिजली आपूर्ति बंद रखी गई। बस्तर की इस सांस्कृतिक परंपरा को देखने देश-विदेश से पर्यटक पहुंचे।





