राजा भोज से हाईकोर्ट तक… 100 साल पुराना भोजशाला विवाद

दिल्ली। भोजशाला को लेकर चला करीब 100 साल पुराना विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने 16 मई को भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना, जिसके बाद आंदोलन से जुड़े लोगों में खुशी का माहौल है।
फैसले के बाद 95 वर्षीय विमल गोधा ने कहा- “मेरे जीते जी कोर्ट का फैसला आया, यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है।” विमल गोधा उन लोगों में शामिल रहे, जिन्होंने भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर साबित करने के लिए लंबे समय तक आंदोलन किया।
वे बताते हैं कि 1993 से 2003 के बीच आंदोलनकारियों और प्रशासन के बीच लगातार टकराव होता रहा। धारा 144, गिरफ्तारी और संतों के प्रवेश पर रोक जैसी कार्रवाई आम थी। 2003 के बसंत पंचमी आंदोलन को याद करते हुए गोधा कहते हैं कि महिलाओं ने भी जमकर संघर्ष किया।
पुलिस ने लाठीचार्ज किया, लेकिन लोग पूजा करने के लिए भोजशाला पहुंचने की कोशिश करते रहे। इस आंदोलन के बाद हिंदुओं को हर मंगलवार आरती की अनुमति मिली। भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक कुमार जैन ने बताया कि 1992 में यहां हनुमान चालीसा पाठ शुरू हुआ था। बाद में प्रतिबंध लगने से आंदोलन और तेज हो गया। आखिरकार 2003 में ASI के आदेश के बाद नियमित पूजा का रास्ता खुला।
भोजशाला का इतिहास 11वीं सदी के राजा भोज से जुड़ा माना जाता है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यहां मां सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र था, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है। मामले में 2022 में हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई थी। ASI सर्वे, शिलालेख और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर हिंदू पक्ष ने मंदिर होने के दावे पेश किए। वहीं मुस्लिम पक्ष ने सर्वे रिपोर्ट और अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए।



