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सितंबर में 10% के पार जा सकती है थोक महंगाई, खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने का असर

दिल्ली। देश में थोक महंगाई सितंबर में 10% के पार पहुंच सकती है। खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है। सितंबर के थोक महंगाई के आंकड़े 14 अक्टूबर को जारी होने हैं। विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, अगस्त में 9.92% रही थोक महंगाई दर सितंबर में और बढ़ सकती है।

थोक महंगाई दर 10% होने का मतलब है कि पिछले साल थोक बाजार में 100 रुपए में मिलने वाला सामान अब करीब 110 रुपए का हो गया है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि सभी वस्तुओं की कीमतों में समान बढ़ोतरी हुई है।

थोक महंगाई बढ़ने का आम लोगों पर असर

थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो इसका असर उद्योगों और कारोबार पर पड़ सकता है। कच्चे माल, मेटल, केमिकल, प्लास्टिक और रबर जैसी चीजों की लागत बढ़ने से कंपनियों का उत्पादन खर्च बढ़ जाता है। ऐसे में कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इससे रोजमर्रा के सामान की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।

सरकार टैक्स में बदलाव के जरिए कुछ वस्तुओं की कीमतों पर राहत देने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, महंगाई पर नियंत्रण के लिए उत्पादन लागत, आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों जैसे कारक भी अहम होते हैं।

खुदरा महंगाई भी बढ़कर 5.54% पर पहुंची

सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54% हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.82% थी। सब्जियों और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी को इसकी प्रमुख वजह बताया गया है। आलू, प्याज और टमाटर जैसी सब्जियों के महंगे होने से घरेलू बजट पर दबाव बढ़ सकता है। मध्य पूर्व में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी महंगाई को प्रभावित कर सकती है।

खुदरा और थोक महंगाई में अंतर

भारत में महंगाई मापने के लिए मुख्य रूप से दो सूचकांकों का इस्तेमाल होता है। खुदरा महंगाई को कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से मापा जाता है। यह उन कीमतों पर आधारित होती है, जो आम ग्राहक वस्तुओं और सेवाओं के लिए चुकाते हैं।

वहीं, थोक महंगाई को होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) से मापा जाता है। इसमें थोक बाजार में कारोबारियों के बीच होने वाले लेनदेन की कीमतों को शामिल किया जाता है। दोनों सूचकांकों में बदलाव का असर अर्थव्यवस्था और आम लोगों के खर्च पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है।

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