कांकेर (उत्तर बस्तर)

Kanker: कभी 133 गांव के लोगों को देता था रोजगार, आज कबाड़ में तब्दील हुआ कारखाना, क्या फिर से होगा शुरू?, Video

प्रसेनजीत साहा@कांकेर। (Kanker) आज से लगभग 60 साल पहले परलकोट में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश विभाजन के बाद बंगबन्धुओ को परलकोट में अलग-अलग 133 गांव में बसाए थे। उस समय केंद्र सरकार द्वारा 133 गांव में बसे बंगबन्धुओ को खेती के लिए जमीन एवं घर के लिए गांव में जमीन दिया था तथा खेतों में फसल उत्पादन करने के लिए परलकोट जलाशय का निर्माण किया। (Koreya) बसाये गये लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए रुई से धागा बनाने वाली सरकारी कारखाना बनाया। जहां गांव के महिला एवं पुरुषों को रोजी रोटी मिलती थी।मगर आज करोड़ों की धागा बनाने वाली 118 जापानी मशीने जंग खा कर कबाड़ बन गया है ।

रुई से धागा बनाने वाले कारखानें की स्थापना

मिली जानकारी के अनुसार DNK प्रोजेक्ट के तहत केंद्र सरकार ने पखांजुर मिक्सफार्म (हॉर्टिकल्चर क्राफ्ट) में 118 रुई से धागा बनाने वाले कारखानें की स्थापना की थी। जिनमें जापानी मशीने लगायी गयी थी।

(Kanker)जहाँ मिक्सफार्म के नजदीकी गांवों के महिला एवं पुरुषों को रोजगार का अवसर मिला। गांव की महिलाओं ने बताया कि उस समय परलकोट क्षेत्र में रोजगार का कोई साधन उपलब्ध नहीं था । क्षेत्र के लोगों के पास पारिवारिक खर्च उठाने का कोई साधन नहीं था । यहां धागा बनाने का कारखाना ग्रामीणों के लिए आय का साधन साबित हुआ।  

हर रोज का 25 पैसे होता था भुगतना

(Kanker) आज गांव की महिला उषा दास ने बताया कि एक बंडल धागा बनाने पर 25 पैसा भुगतान मिलता था एवं माह भर में उन्हें 250 से 300 रुपए मिलता था । जिससे लगभग उस समय महीना भर का घर का खर्च चल जाता था । सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक कारखाना में मजदूर बड़े ही उत्साह के साथ रुई से धागा बनाने का काम करते थे । पहले तो रुई को अलग-अलग मशीनों के जरिए धुनाई कर धागा बनाने की मशीन से धागा बनाया जाता था। फिर वही धागा को बंडलों को पैक कर बाहर भेजा जाता था ।

आज सैकड़ों ग्रामीणों के सामने रोजी-रोटी की संकट

आज इस कोरोना काल में मंदी से जूझ रही महिलाओं और ग्रामीणों ने बताया हैं कि धागा बनाने का कारखाना आज चालू होता तो सैकड़ों ग्रामीणों को रोजी रोटी के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ता। महिलाओं ने ये भी कहा की आज से करीबन 30 साल पहले ये धागा बनाने का कारखाना बंद हो गया है । तब से कारखाने में नियमित रूप से रोजी रोटी कमाने वाले मजदूरों ने महीनों तक इंतजार किया। लेकिन कोई रास्ता नहीं सुझने पर दूसरे रास्ते को चुन लिया। आज वही मजदूर खेतों में मजदूरी करने को मजबूर हो गए। इन महिलाओं ने सरकार से मांग किया है कि ऐसा ही धागा बनाने का कारखाना खोला जाए ताकि मिक्सफार्म क्षेत्र के मजदूरों को फिर से मजदूरी मिल सके।

30 सालों से 118 मशीने खा रही जंग

वही बंद कारखाना के बारे में मिक्सफार्म में पदस्त माली तुलाराम ने बताया कि आज 34 सालों से वह मिसफार्म में निरंतर माली पद पर कायर्रत हैं । उन्होंने कहा कि आज से लगभग 30 साल पहले ये कारखाना केंद्र सरकार द्वारा संचालित किया जाता था। यह गांव की सैकड़ों महिला एवं पुरुष धागा बनाने का काम करते थे। गाड़ियों में भरकर रुई बाहर से मंगवाया जाता था। अलग-अलग विधि से रुई को तैयार कर धागा बनाया जाता था। 30 सालों से ये 118 जापानी मशीने जंग खा रही हैं । कोई भी देखने तक नहीं आते हैं वो तो मिक्सफार्म के भीतर केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कारखाना हैं इस वजय से आज भी ये मशीनों को देखने को मिल रहा है । मिक्सफार्म के कर्मचारियों ने कारखाना की घर में सारा मशीने रखे हुए हैं । कही बाहर रखा होता तो अब तक मशीनों पर चोरो ने हाथ साफ कर दिया होता।

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क्या 50 साल पहले शुरू हुआ कारखाना फिर से होगा शुरू

अब देखने वाली बात ये होगी कि 50 साल पहले केंद्र सरकार द्वारा संचालित धागा बनाने वाले कारखाने को केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार पुनः शुभारंभ कर पाते हैं या नहीं । क्योंकि आज भी कारखाने में काम करने वाले मजदूरों में धागा बनाने वाले कारखाने में रोजी रोटी कमाने की इच्छा जताई है।

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