रायपुर। बस्तर की पहचान लंबे समय तक नक्सल हिंसा और भय से जुड़ी रही, लेकिन अब कई इलाकों में बदलाव की तस्वीर दिखाई दे रही है। दिल्ली से पहुंचे 43 इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा और पूवर्ती तक करीब 13 घंटे की यात्रा कर इस बदलाव को करीब से देखा।
पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित पूर्व नक्सलियों से संवाद से लेकर 21 साल बाद खुले श्रीराम मंदिर में पूजा और हिडमा के परिवार से मुलाकात तक, यात्रा में बस्तर के अतीत और वर्तमान की कई तस्वीरें सामने आईं।
सुकमा पहुंचने के बाद इंफ्लुएंसर्स ने पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से बातचीत की। उन्होंने आत्मसमर्पण के बाद बदली जिंदगी और सामान्य जीवन में लौटने के अनुभवों को समझा। इसके बाद सुकमा एसपी से मुलाकात कर सुरक्षा, शांति और विकास से जुड़ी पहल की जानकारी ली। दल ने साइंस पार्क का भी भ्रमण किया।
‘खूनी सड़क’ से जगरगुंडा तक
इसके बाद दल जगरगुंडा की ओर रवाना हुआ। रास्ते में उन्हें उस दौर की जानकारी दी गई, जब यह इलाका नक्सली हिंसा से प्रभावित था। जगरगुंडा क्षेत्र 6 अप्रैल 2010 के ताड़मेटला हमले की स्मृति से भी जुड़ा है, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवानों की जान गई थी।
21 साल बाद फिर सुनाई दी मंदिर की घंटियां
केरलापेंदा में इंफ्लुएंसर्स ने ग्रामीणों से संवाद किया और श्रीराम मंदिर पहुंचकर बदलाव की कहानी देखी। माओवादी प्रभाव के दौरान करीब 21 वर्षों तक मंदिर में पूजा बंद रही थी। अप्रैल 2024 में सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई हुई और पूजा दोबारा शुरू की गई। अब यहां फिर घंटियां बज रही हैं और दीप जल रहे हैं।
पूवर्ती में हिडमा के परिवार से मुलाकात
यात्रा के अंतिम चरण में दल पूवर्ती पहुंचा। यहां उन्होंने नक्सली कमांडर हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से बातचीत की। गांव की वर्तमान स्थिति और स्थानीय लोगों के जीवन में आए बदलावों को समझा।
सुकमा से पूवर्ती तक की इस यात्रा में इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर के संघर्षपूर्ण अतीत के साथ पुनर्वास, सुरक्षा, विकास, आस्था और सामान्य जीवन की वापसी की तस्वीर भी देखी।
