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वनतारा को सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट, कानूनों के उल्लंघन का आरोप खारिज

दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ‘करणार्थम विरम फाउंडेशन’ द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें वनतारा में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि वनतारा की गतिविधियों में किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है। अदालत ने पिछले साल जस्टिस जे. चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली विशेष जांच टीम (SIT) द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट को सही ठहराते हुए उसे पूरी तरह स्वीकार कर लिया है।

SIT रिपोर्ट और CITES के मानक

अदालत ने कहा कि जानवरों के आयात और उनके रखरखाव से जुड़ा मुद्दा नया नहीं है और इस पर पहले ही विस्तृत जांच हो चुकी है। 12 सितंबर 2025 को सौंपी गई SIT रिपोर्ट के अनुसार, जानवरों का आयात अंतरराष्ट्रीय संधि (CITES) के तहत आवश्यक परमिट और दस्तावेजों के साथ किया गया था। कोर्ट ने साफ किया कि यह आयात व्यापारिक उद्देश्यों के लिए नहीं था, बल्कि संरक्षण के लिए था। अगर आयात के समय सभी प्रक्रियाएं वैध थीं, तो बाद में उन पर सवाल उठाकर उन्हें अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

हथिनी ‘माधुरी’ का विवाद और स्थानांतरण

यह पूरा मामला कोल्हापुर के एक जैन मठ में 32 साल से रह रही ‘माधुरी’ नाम की हथिनी को वनतारा शिफ्ट किए जाने के बाद गरमाया था। PETA इंडिया ने हथिनी के स्वास्थ्य और मानसिक तनाव को लेकर चिंता जताई थी, जिसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने उसे गुजरात के वनतारा अभयारण्य भेजने का आदेश दिया था। हालांकि, स्थानीय लोगों ने इसे धार्मिक परंपराओं के खिलाफ बताते हुए विरोध प्रदर्शन भी किए थे, लेकिन कोर्ट ने पशु कल्याण को प्राथमिकता देते हुए स्थानांतरण को सही माना।

भविष्य की निगरानी और पारदर्शिता

याचिकाकर्ता ने वन्यजीव व्यापार की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज के नेतृत्व में एक नई राष्ट्रीय समिति बनाने की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया। अदालत का मानना है कि वर्तमान नियामक संस्थाएं और SIT द्वारा की गई जांच पर्याप्त है। इस फैसले के बाद वनतारा को अपने पशु संरक्षण और पुनर्वास कार्यक्रमों को सुचारू रूप से चलाने के लिए कानूनी मजबूती मिली है।

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