नई दिल्ली/एवियन। फ्रांस के एवियन शहर में सोमवार से 52वीं जी-7 शिखर बैठक शुरू हो गई है। तीन दिवसीय इस सम्मेलन में दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के नेता वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संकटों पर चर्चा करेंगे। सम्मेलन में शामिल होने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेन फ्रांस पहुंच चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को स्लोवाकिया से एवियन पहुंचेंगे।
फ्रांस पहुंचने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ द्विपक्षीय बैठक की। इस दौरान मैक्रों ने अमेरिका-ईरान समझौते का स्वागत करते हुए इसे विश्व शांति के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि इस समझौते से ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी को मजबूती मिलेगी और क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-7 सम्मेलन में वैश्विक नेताओं के साथ कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करेंगे। इस दौरान उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मुलाकात की भी संभावना जताई जा रही है। सम्मेलन में यूक्रेन युद्ध, ईरान, मध्य पूर्व की स्थिति, वैश्विक अर्थव्यवस्था और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मुद्दे प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं।
यह प्रधानमंत्री मोदी का 12 साल के कार्यकाल में 100वां विदेशी दौरा है। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने अब तक 78 देशों की यात्रा की है। मोदी पहली बार 2019 में फ्रांस में आयोजित जी-7 बैठक में शामिल हुए थे। इसके बाद वे 2021, 2022, 2023, 2024 और 2025 की बैठकों में भी हिस्सा ले चुके हैं।
क्या है जी-7 और भारत की भूमिका
जी-7 दुनिया के सात प्रमुख विकसित देशों का समूह है, जिसमें अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान शामिल हैं। इसकी शुरुआत 1975 में छह देशों के समूह के रूप में हुई थी। 1976 में कनाडा के जुड़ने के बाद इसका नाम जी-7 पड़ा।
भारत इस समूह का सदस्य नहीं है, लेकिन दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका के कारण उसे विशेष आमंत्रित देश के रूप में बुलाया जाता है। प्रधानमंत्री मोदी अब तक सात बार जी-7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले चुके हैं।
जी-7 का कोई स्थायी कार्यालय नहीं है और इसके फैसले कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन वैश्विक राजनीति, सुरक्षा और आर्थिक नीतियों पर इसका प्रभाव काफी अधिक माना जाता है। शुरुआत में इसका मुख्य फोकस आर्थिक मुद्दों पर था, लेकिन समय के साथ जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, स्वास्थ्य, युद्ध और तकनीकी विकास जैसे विषय भी इसके एजेंडे में शामिल हो गए हैं।
