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रायपुर साहित्य उत्सव में छत्तीसगढ़ी काव्य पाठ, लोकभाषा और संवेदना से सजा साहित्यिक मंच

रायपुर। रायपुर साहित्य उत्सव के अंतर्गत श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में रविवार को तृतीय सत्र के रूप में “छत्तीसगढ़ी काव्य पाठ” का आयोजन किया गया। यह सत्र प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय पवन दीवान जी को समर्पित रहा। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार भरत द्विवेदी ने किया।

इस काव्य सत्र में रामेश्वर वैष्णव, रामेश्वर शर्मा, मीर अली मीर, शशि सुरेंद्र दुबे तथा श्रद्धा संतोषी महंत ने अपनी रचनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा, लोकसंस्कृति और सामाजिक संवेदनाओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम की शुरुआत श्रद्धा संतोषी महंत के काव्य पाठ से हुई। इसके बाद कवि मीर अली मीर ने “महानदी संगम में राजिम”, “नई पटियावय दाई कोई…” और “नंदा जाहि का रे…” जैसी रचनाओं का पाठ कर छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की सुगंध बिखेरी।

हास्य कवयित्री शशि सुरेंद्र दुबे ने छत्तीसगढ़ी भाषा की गरिमा और मधुरता पर आधारित कविता प्रस्तुत की, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा। कवि रामेश्वर शर्मा ने श्यामलाल चतुर्वेदी और पवन दीवान जी को समर्पित रचनाओं का पाठ किया। उनकी कविता “मोर गंवई गांव है…” ने ग्रामीण जीवन, रिश्तों और संस्कृति का जीवंत चित्र उकेरा।

कवि एवं गीतकार रामेश्वर वैष्णव ने छत्तीसगढ़ को काव्य की जननी बताते हुए कहा कि इस धरती से ही आदिकवि वाल्मीकि की लेखनी को प्रेरणा मिली। उन्होंने अपने लोकप्रिय गीत “झन बुलव मां-बाप ल…” और विवाह पर आधारित हास्य कविता “ओ तो अच्छा हुआ मैं नई गेव बरात मा…” का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

सूत्रधार भरत द्विवेदी ने अपने रोचक संचालन और लोकप्रचलित पंक्तियों से पूरे सत्र को जीवंत बनाए रखा। काव्य पाठ के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा की सांस्कृतिक गरिमा, पारिवारिक मूल्यों और लोकसंवेदनाओं का सुंदर प्रस्तुतीकरण हुआ, जिसे श्रोताओं ने मुक्त कंठ से सराहा।

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