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“दीदी के बखरी” से बदल रही तस्वीर: कांकेर में एकीकृत कृषि से महिलाओं की आय और पोषण में बढ़ोतरी

रायपुर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में महिलाओं की आजीविका और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए शुरू की गई “दीदी के बखरी” पहल एक नई क्रांति का रूप ले रही है। एकीकृत कृषि मॉडल के तहत सब्जी बाड़ी, पोषण वाटिका, मुर्गी पालन, मछली पालन और वनोपज संग्रहण जैसी गतिविधियों से ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं।

यह पहल बिहान योजना के अंतर्गत संचालित की जा रही है, जिसका उद्देश्य महिलाओं की आय बढ़ाना और उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। जिले के नरहरपुर, कांकेर, चारामा और भानुप्रतापपुर विकासखंडों में यह योजना तेजी से आगे बढ़ रही है। वर्तमान में 3364 महिला किसान इससे जुड़ी हुई हैं और वित्त वर्ष 2026-27 में 10,780 महिलाओं को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

महिलाएं अपने घरों की बाड़ी (बखरी) में सब्जियों की व्यावसायिक खेती कर बाजार में बिक्री कर रही हैं, जिससे उनकी मासिक आय 20 से 25 हजार रुपए तक पहुंच रही है। इसके साथ ही मुर्गी पालन, बकरी पालन और मछली पालन से अतिरिक्त आय भी हो रही है।

नरहरपुर की महिला किसान सुरेखा नेताम ने ग्राफ्टेड सब्जियों और मुर्गी पालन से अपनी आय बढ़ाई है। वहीं ग्राम ठेमा की नामिका यादव वनोपज संग्रहण और पशुपालन से आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। भानुप्रतापपुर की मोतिन दर्रो ने पोल्ट्री-कम-फिश मॉडल अपनाकर लागत कम और लाभ अधिक किया है।

इस योजना के तहत क्लस्टर स्तर पर आजीविका सेवा केंद्र भी खोले जा रहे हैं, जहां महिलाओं को बीज, खाद और कृषि उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। “दीदी के बखरी” न केवल आय का स्रोत बन रही है, बल्कि पोषण और स्वास्थ्य सुधार में भी अहम भूमिका निभा रही है।

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