जगदलपुर। इंद्रावती के घने जंगलों से निकलकर आ रही एक अपुष्ट खबर ने बस्तर के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। दशकों से सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बना शीर्ष माओवादी कमांडर पापा राव, अपने 17 साथियों के साथ आत्मसमर्पण की राह पर बताया जा रहा है। हालांकि अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, वह हथियारों के साथ मुख्यधारा में लौटने के लिए जंगल से बाहर निकल चुका है।
करीब 25 लाख रुपये के इनामी पापा राव का आत्मसमर्पण माओवादी संगठन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। वह वेस्ट बस्तर डिवीजन का सचिव और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का कद्दावर सदस्य रहा है। विशेषज्ञ इसे केवल एक व्यक्ति का सरेंडर नहीं, बल्कि पूरे संगठनात्मक ढांचे के ढहने का प्रतीक मान रहे हैं।
सुरक्षा बलों की रणनीतिक घेराबंदी और ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ने पहले ही संगठन को कमजोर कर दिया था। बसव राजू और हिड़मा जैसे बड़े नामों के खात्मे के बाद अब बस्तर में नेतृत्व का संकट खड़ा हो गया है। आंकड़ों के अनुसार, अब इस क्षेत्र में केवल 50 के करीब सक्रिय माओवादी बचे हैं।
बदलाव की बयार और अंतिम चुनौती
माओवाद के कमजोर होने के पीछे केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि विकास की पहुंच भी है। जिन इलाकों में कभी माओवादियों की ‘जनताना सरकार’ चलती थी, वहां अब स्कूल, सड़कें और सुरक्षा कैंप स्थापित हो चुके हैं। सरकार की बेहतर नीतियों ने अब तक करीब 2700 माओवादियों को हथियार छोड़ने पर मजबूर किया है।
बस्तर में जीत के करीब पहुंचने के बाद अब सुरक्षा एजेंसियों की नजरें झारखंड पर टिकी हैं। वहां पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा अभी भी चुनौती बना हुआ है। हालांकि उसकी लोकेशन मिल चुकी है, लेकिन बारूदी सुरंगों के जाल के कारण ऑपरेशन जटिल बना हुआ है। केंद्रीय गृहमंत्री के 31 मार्च 2026 तक माओवाद मुक्त भारत के लक्ष्य की दिशा में पापा राव का यह कदम एक निर्णायक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
