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हाईकोर्ट का आदेश: मुस्लिम व्यक्ति पूरी संपत्ति वसीयत नहीं कर सकता, वारिसों की सहमति जरूरी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा वसीयत के जरिए किसी को नहीं दे सकता, जब तक कि बाकी वैध वारिस अपनी सहमति न दें। यह फैसला कोरबा जिले से जुड़े एक मामले में आया है, जिसमें एक विधवा जैबुननिशा ने अपने पति अब्दुल सत्तार लोधिया की जायदाद में हिस्सा मांगते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी।

जैबुननिशा के पति की 2004 में मौत हो गई थी। इसके बाद भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने एक वसीयत पेश की, जिसमें दावा किया कि सारी जायदाद उसे मिलेगी। उसने खुद को “पालक बेटा” बताया। जैबुननिशा ने इस वसीयत को फर्जी बताया और कहा कि यह उनकी सहमति के बिना बनाई गई थी।

लोअर कोर्ट ने जैबुननिशा की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने सुनवाई के बाद निचली अदालतों के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि निचली अदालतें विधवा के वैध कानूनी अधिकारों की रक्षा करने में असफल रहीं।

हाईकोर्ट ने मुस्लिम लॉ के सेक्शन 117 और 118 का हवाला देते हुए कहा कि मुस्लिम व्यक्ति अपनी जायदाद का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है। यदि उससे अधिक हिस्सा वसीयत किया जाता है या किसी वारिस को दिया जाता है, तो बाकी वारिसों की सहमति आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ चुप रहने या केस में देरी करने को सहमति नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय देते हुए जोर दिया कि वारिसों के अधिकारों की सुरक्षा मुस्लिम कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है। किसी भी वसीयत का एक तिहाई से अधिक हिस्सा वारिसों की मंजूरी के बिना प्रभावी नहीं हो सकता। हाईकोर्ट के इस आदेश से मुस्लिम परिवारों में संपत्ति के उत्तराधिकार और वसीयत संबंधी विवादों में स्पष्टता आई है। यह निर्णय मुस्लिम कानून के तहत वारिसों के हक और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

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