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वेलफेयर से वूमेन-लेड डेवलपमेंट तक,भारत में महिला सशक्तिकरण की नई तस्वीर

नई दिल्ली। भारत में महिला सशक्तिकरण का लक्ष्य महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से आत्मनिर्भर, शिक्षित और समान अधिकार संपन्न बनाना है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार की योजनाओं और नीतियों ने इस दिशा में ठोस बदलाव लाए हैं। “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”, मुद्रा योजना और महिला आरक्षण जैसे प्रयासों से महिलाओं की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी लगातार बढ़ी है, हालांकि पितृसत्तात्मक सोच और सुरक्षा चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं।

महिला सशक्तिकरण की अवधारणा अब “वेलफेयर” से आगे बढ़कर “एम्पावरमेंट” और “वूमेन-लेड डेवलपमेंट” के रूप में विकसित हो चुकी है। यानी अब महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास की अगुवाई करने वाला माना जा रहा है। स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में मिशन पोषण 2.0 और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसी पहलों से करोड़ों महिलाओं को लाभ मिला है। फरवरी 2026 तक 4.27 करोड़ महिलाओं को 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक की सहायता दी जा चुकी है।

आर्थिक सशक्तिकरण में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। जनधन योजना के तहत 32 करोड़ से अधिक खाते महिलाओं के नाम हैं, जबकि मुद्रा योजना के कुल ऋणों में लगभग 68 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की है। स्वयं सहायता समूहों से 10 करोड़ से अधिक महिलाएं जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं।

शिक्षा और कौशल विकास में भी सकारात्मक बदलाव दिख रहा है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में लाखों छात्राएं पढ़ाई कर रही हैं, वहीं उच्च शिक्षा में महिलाओं का नामांकन लगातार बढ़ रहा है।

महिलाओं की सुरक्षा के लिए मिशन शक्ति के तहत वन स्टॉप सेंटर और हेल्पलाइन सेवाओं का विस्तार किया गया है। इसके अलावा उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने महिलाओं के जीवन स्तर और गरिमा को बेहतर बनाया है।

कुल मिलाकर, भारत में महिला सशक्तिकरण अब एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक बदलाव का आधार बन चुका है, जहां महिलाएं देश के विकास की दिशा तय करने में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।

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