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हर भारतीय को एक दक्षिण भारतीय भाषा सीखनी चाहिए: शिवराज सिंह

दिल्ली। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शनिवार को कहा कि हर भारतीय को कम से कम एक दक्षिण भारतीय भाषा अवश्य सीखनी चाहिए।

उन्होंने मंच से यह भी बताया कि वे स्वयं भी किसी एक दक्षिण भारतीय भाषा को सीखने का प्रयास कर रहे हैं। चौहान तमिलनाडु के होसुर में आयोजित मेगा किसान संगोष्ठी में शामिल हुए थे, जिसका आयोजन सद्गुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन द्वारा किया गया।

अपने संबोधन में चौहान ने कहा कि भारत की भाषाई विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। अगर देश के लोग एक-दूसरे की भाषाएं सीखें, तो आपसी समझ और भावनात्मक जुड़ाव बढ़ेगा, जिससे राष्ट्रीय एकता और मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा को समझने की कुंजी है।

इस दौरान चौहान ने बताया कि सद्गुरु जग्गी वासुदेव के अनुभवों और प्रयासों से प्रेरित होकर केंद्र सरकार वृक्ष आधारित कृषि यानी ट्री-बेस्ड फार्मिंग को लेकर नई नीति बनाने पर काम कर रही है।

उन्होंने कहा कि ईशा फाउंडेशन पहले से ही इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

शिवराज ने अपनी दो अहम बातों को रेखांकित करते हुए कहा कि ईशा फाउंडेशन किसानों के बीच पेड़ आधारित खेती को बढ़ावा दे रहा है, जिसमें पर्यावरण सुधार और किसान समृद्धि की बड़ी संभावनाएं हैं।

सद्गुरु के मार्गदर्शन में किसानों को प्रकृति संरक्षण का भागीदार बनाने के प्रयास लगातार जारी रहेंगे। उन्होंने ‘सेव सॉयल’ अभियान का भी जिक्र किया और कहा कि स्वस्थ मिट्टी जीवन, खाद्य सुरक्षा और जलवायु संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है। पुनर्योजी खेती से जमीन को नुकसान पहुंचाने के बजाय उसे फिर से उपजाऊ बनाया जा सकता है।

कार्यक्रम में सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कहा कि खेती को बेवजह के नियमों और पाबंदियों से मुक्त किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि कृषि भूमि पर उगाई जाने वाली फसलों और जंगलों में उगने वाले उत्पादों के बीच स्पष्ट अंतर तय किया जाए, ताकि किसानों को उनके अधिकार मिल सकें।

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