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बंगाल में दीदी बनाम मोदी की बिसात: ममता मोर्चे पर, भाजपा को स्थानीय चेहरे की तलाश

दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर गरमाई हुई है। सियासी फिजा में ‘M’ फैक्टर हावी है।

महिला, मुस्लिम, मस्जिद, मंदिर, मछली, मटन, मनी और मसल पावर… और सबसे अहम, ममता बनाम मोदी। राज्य की राजनीति अब दो ध्रुवों में बंटी दिख रही है, जैसे कभी फुटबॉल में मोहन बागान और ईस्ट बंगाल आमने-सामने होते हैं।

15 साल से सत्ता में काबिज Mamata Banerjee आज भी आक्रामक अंदाज में मोर्चे पर हैं। वाममोर्चा के 34 साल के शासन को खत्म कर सत्ता में आईं ममता अब भी तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत हैं।

लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं और मुस्लिम वोट बैंक का एकजुट समर्थन पार्टी का प्रमुख आधार है। टीएमसी चाहती है कि चुनाव फिर से ‘दीदी बनाम मोदी’ की सीधी लड़ाई बन जाए।

वहीं भाजपा प्रधानमंत्री Narendra Modi के चेहरे, अनुशासित संगठन और ‘डबल इंजन’ के नारे के साथ मैदान में है। हालांकि राज्य स्तर पर ममता के कद का चेहरा न होना भाजपा की चुनौती है।

पार्टी 77 सीटों से आगे बढ़कर बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने की रणनीति बना रही है। नेता प्रतिपक्ष सुभेंदु अधिकारी और प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य संगठन को धार देने में जुटे हैं।

भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाला, मंत्रियों की गिरफ्तारी और एंटी-इन्कंबेंसी ममता के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। बावजूद इसके, सड़क पर सक्रियता और कैडर की मजबूती टीएमसी को बढ़त देती दिख रही है।

भाजपा भी घुसपैठ, कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर आक्रामक है। केंद्रीय नेतृत्व के दौरों और बूथ स्तर तक डोर-टू-डोर अभियान के जरिए पार्टी चुनावी जमीन मजबूत करने में जुटी है। बंगाल में मुकाबला दिलचस्प और सीधा होता जा रहा है।

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