राजधानी दिल्ली में साहित्यिक परिचर्चा, विनोद कुमार शुक्ल को किया गया याद

दिल्ली। रायपुर में 23 से 25 जनवरी 2026 तक होने वाले साहित्य उत्सव की पृष्ठभूमि में राजधानी दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल के रचना-कर्म और उनके साहित्यिक अवदान को भावपूर्ण ढंग से स्मरण किया गया तथा साहित्य उत्सवों की प्रासंगिकता पर सार्थक संवाद स्थापित किया गया।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने विनोद कुमार शुक्ल से पहली मुलाकात को याद करते हुए कहा कि वे जितने बड़े साहित्यकार थे, उतने ही सरल और सहज व्यक्ति भी थे। उनकी बातचीत में आत्मीयता होती थी और वे बिना किसी लाग-लपेट के सीधे शब्दों में अपनी बात कहते थे, जो उनके लेखन की भी विशेषता रही।
छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने कहा कि युवा वर्ग उनसे गहराई से जुड़ा रहता था। उन्होंने बताया कि विनोद कुमार शुक्ल ने उनसे एक बातचीत में कहा था कि वे जीवन में बहुत गंभीर लेखन कर चुके हैं, पर नई पीढ़ी के साथ न्याय करने का अवसर उन्हें बाल साहित्य के माध्यम से मिला।
साहित्यकार अलका जोशी ने कहा कि उनकी रचनाओं की खासियत यह थी कि वे साधारण स्थितियों में भी सौंदर्य खोज लेते थे। ‘नौकर की कमीज’ और ‘एक दीवार में खिड़की रहती है’ जैसी रचनाओं में उन्होंने सत्ता के प्रति रोष और आम आदमी के सपनों को बेहद सादगी से व्यक्त किया।
पहले सत्र में लेखक अनंत विजय ने कहा कि साहित्य उत्सव तभी सार्थक होंगे जब उनमें गहराई और ठोस कंटेंट होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि रायपुर साहित्य उत्सव पूरी तरह व्यावसायिकता से दूर रहेगा और साहित्य को केंद्र में रखेगा।
साहित्यकार अनिल जोशी ने भी कहा कि नई पीढ़ी फिर से किताबों से जुड़ रही है, जो सकारात्मक संकेत है। कार्यक्रम में प्रताप सोमवंशी ने नई और पारंपरिक लेखन शैलियों के समानांतर विकास पर प्रकाश डाला। परिचर्चा में पंकज झा, संजीव सिन्हा सहित देशभर के प्रतिष्ठित साहित्यकार उपस्थित रहे।





