नारायणपुर। छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़, जिसे कभी ‘नक्सलियों का गढ़’ और अभेद्य किला माना जाता था, अब अपनी पहचान बदल रहा है। नारायणपुर जिले से 50 किमी दूर स्थित इस दुर्गम क्षेत्र में पहली बार फोरलेन सड़क का निर्माण हो रहा है, जो न केवल छत्तीसगढ़ को महाराष्ट्र से जोड़ रही है, बल्कि डर के साये में जी रहे आदिवासियों को मुख्यधारा से भी मिला रही है।
लाल आतंक का अंत और नई शुरुआत
अबूझमाड़ के प्रवेश द्वार पर अब पुलिस का पहरा है, जहाँ पहले नक्सलियों का बैरिकेड होता था। स्थानीय निवासी सुकमती मेटामी की बातों में यहाँ का दर्द छलकता है। वह बताती हैं कि पहले बच्चों के 12 साल के होते ही नक्सली उन्हें उठा ले जाते थे, लेकिन अब बच्चे सुरक्षित हैं। ग्रामीणों को शहर जाने या बीमार होने पर अस्पताल जाने के लिए भी नक्सलियों की अनुमति लेनी पड़ती थी। आज यहाँ पहला अस्पताल बन रहा है और पगडंडियों की जगह बसें दौड़ रही हैं।
नक्सलियों की वसूली और आत्मसमर्पण
बासिंघ और गरपा जैसे गाँवों में नक्सली जबरन अनाज वसूलते थे और विरोध करने पर जान से मार देते थे। अब स्थिति बदल चुकी है। अनथ कवची जैसे पूर्व नक्सली अब सुरक्षा बलों के साथ मिलकर बचे हुए नक्सलियों को खोज रहे हैं। ग्रामीणों के मन में अभी भी पुराने जख्म हैं, लेकिन विकास की इमारतों ने नई उम्मीद जगाई है।
96% नक्सलमुक्त बस्तर
राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा के अनुसार, 31 मार्च की डेडलाइन से पहले ही बस्तर का 96 प्रतिशत क्षेत्र नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दंतेवाड़ा में 1 और नारायणपुर में 2 नक्सली बचे है। अबूझमाड़ के जंगलों में गृहमंत्री की ‘मॉर्निंग वॉक’ की तस्वीर इस बात का प्रतीक है कि अब वहां गोलियों की गूंज नहीं, बल्कि शांति की सुबह हो चुकी है। यह बदलाव दर्शाता है कि सुरक्षा बलों के कैंप और सड़कों के जाल ने लाल आतंक की कमर तोड़ दी है।
