दिल्ली। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) की बढ़ती सक्रियता को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।
आर्थिक अपराधों, काले धन और मनी-लॉन्ड्रिंग की जांच करने वाली एजेंसी पर आरोप है कि वह पुराने मामलों की फाइलें चुनावी मौसम में खोलती है। कोलकाता में I-PAC से जुड़े ठिकानों पर 8 जनवरी 2026 को हुई छापेमारी के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और ED आमने-सामने हैं।
जबकि यह केस नवंबर 2020 में दर्ज हुआ था और अब पांचवें साल में है, लेकिन पहली बड़ी कार्रवाई चुनाव से महज 2-3 महीने पहले सामने आई।
यह पैटर्न नया नहीं है। पिछले चार सालों में झारखंड, दिल्ली और महाराष्ट्र में भी ऐसा ही देखने को मिला। झारखंड में अगस्त 2023 में भूमि और मनी-लॉन्ड्रिंग केस दर्ज हुआ और जनवरी 2024 में, यानी चुनाव से करीब 10 महीने पहले, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गिरफ्तार कर लिया गया।
दिल्ली में 2022 की शराब नीति से जुड़े मामले में फरवरी 2023 में मनीष सिसोदिया और मार्च 2024 में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी हुई, जबकि फरवरी 2025 में विधानसभा चुनाव थे। महाराष्ट्र में 2021 के पुराने केस में नवंबर 2024 में, चुनाव से महज छह दिन पहले, 23 जगहों पर छापेमारी कर विपक्षी दलों को घेरा गया।
अब जब 2026 में पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव होने हैं, इन राज्यों में भी ED ने पुरानी फाइलें निकालनी शुरू कर दी हैं। तमिलनाडु में शराब, रियल एस्टेट और शेल कंपनियों से जुड़े केस डीएमके सरकार के लिए चुनौती बन रहे हैं।
असम में भाजपा सत्ता में है, लेकिन कांग्रेस और एआईयूडीएफ नेताओं पर कार्रवाई का डर चुनावी फंडिंग नेटवर्क को प्रभावित कर रहा है। केरल में सोना तस्करी और सहकारी बैंक घोटाले एलडीएफ सरकार को घेरे हुए हैं, जबकि पुडुचेरी में कारोबारी-राजनीतिक गठजोड़ पर एजेंसी की नजर है।
ED हर बार यही दलील देती है कि उसकी कार्रवाई पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत होती है और चुनाव से इसका कोई संबंध नहीं। मगर बार-बार चुनाव से ठीक पहले पुराने मामलों में तेजी, छापेमारी और गिरफ्तारियां इस सवाल को मजबूत करती हैं कि क्या जांच एजेंसी की टाइमिंग भी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है?
