नक्सल पुनर्वास नीति के तहत 40 आत्मसमर्पित माओवादियों को आजीविका से जोड़ा जा रहा
रायपुर। अगर मन में बदलाव का जज्बा हो तो सबसे कठिन राह भी आसान बन जाती है। इस बात को आत्मसमर्पित माओवादियों ने सच कर दिखाया है। जिन हाथों में कभी बंदूक थी, आज वही हाथ हुनर सीखकर आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहे हैं। राज्य शासन की नक्सल पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए जिला प्रशासन द्वारा ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।
उत्तर बस्तर कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम चौगेल (मुल्ला) स्थित बीएसएफ कैंप परिसर में 40 आत्मसमर्पित माओवादियों को विभिन्न आजीविका मूलक गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह कैंप अब ‘कौशलगढ़’ के रूप में विकसित हो चुका है, जहां ड्राइविंग, सिलाई, काष्ठशिल्प कला, सहायक इलेक्ट्रिशियन जैसे ट्रेड में उन्हें प्रशिक्षित किया जा रहा है। साथ ही निरक्षर माओवादियों को कक्षा पहली से आठवीं तक की प्राथमिक शिक्षा भी दी जा रही है।
ड्राइविंग का प्रशिक्षण ले रहे 40 वर्षीय मनहेर तारम ने बताया कि उन्हें चारपहिया वाहन चलाने का शौक था, जो अब पूरा हो रहा है। वहीं नरसिंह नेताम ने कहा कि यहां मिली ट्रेनिंग से भविष्य में रोजगार का रास्ता खुलेगा। 19 वर्षीय सुकदू पद्दा और काजल वेड़दा ने बताया कि प्रशिक्षण के साथ शिक्षा और सिलाई जैसे हुनर उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद कर रहे हैं।
कैंप में स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा नियमित स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है। मनोरंजन के लिए कैरम, खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं। नोडल अधिकारी विनोद अहिरवार ने बताया कि कलेक्टर के निर्देश पर 20-20 के बैच में प्रशिक्षण दिया जा रहा है और भविष्य में मशरूम उत्पादन, बागवानी जैसे स्वरोजगार मूलक कोर्स भी शुरू किए जाएंगे। राज्य शासन की यह पहल हिंसा से दूर लौटे लोगों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर दे रही है और बस्तर में शांति व विकास की नई कहानी लिख रही है।
