दिल्ली। देश की शीर्ष अदालत ने फर्जी इंश्योरेंस पॉलिसी के बढ़ते मामलों पर कड़ा रुख अख्तियार किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक मोटर दुर्घटना दावे में ‘फेक पॉलिसी’ के उपयोग को गंभीरता से लेते हुए नेशनल इंश्योरेंस कंपनी (NIC) के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) को आपराधिक मामले में आरोपी बनाने का ऐतिहासिक आदेश दिया है। साथ ही, मामले की गहराई से पड़ताल के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) के गठन का निर्देश दिया है।
“टेस्ट केस” मानकर होगी सख्त कार्रवाई
जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इंश्योरेंस कंपनियां जनता के पैसे का प्रबंधन करती हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी और सतर्कता अनिवार्य है।
कोर्ट ने इसे राष्ट्रीय महत्व का “टेस्ट केस” करार दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि नई प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर इसमें न केवल एनआईसी के सीएमडी, बल्कि स्थानीय ब्रांच मैनेजर और संबंधित बस मालिक को भी आरोपी बनाया जाए।
तमिलनाडु DGP ने मांगी माफी
इससे पहले, कोर्ट ने तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया था।
दरअसल, पुलिस की ओर से एक हलफनामे में यह तर्क दिया गया था कि दुर्घटना के समय बीमा दस्तावेजों की प्रामाणिकता जांचना पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य नहीं है। कोर्ट ने इस लापरवाह रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद DGP ने कोर्ट में पेश होकर बिना शर्त माफी मांगी, जिसे बेंच ने स्वीकार कर लिया।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला के. सरवनन नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जो एक बस दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्होंने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में मुआवजे की याचिका दायर की थी।
एनआईसी (NIC) ने निचली अदालतों में तर्क दिया था कि बस मालिक की ‘थर्ड पार्टी इंश्योरेंस पॉलिसी’ वैध नहीं थी, लेकिन अदालतों ने कंपनी के दावों को खारिज कर मुआवजे का आदेश दिया।
अब सुप्रीम कोर्ट इस बात की जांच कर रहा है कि क्या जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दावे किए जा रहे हैं या कंपनियों द्वारा प्रक्रियाओं में ढील दी जा रही है। SIT को निर्देश दिया गया है कि वह फर्जी दस्तावेज बनाने के गिरोह का पर्दाफाश करे और जल्द से जल्द ठोस निष्कर्ष पर पहुंचे।
