राज्यों की बिगड़ती वित्तीय सेहत: 80 प्रतिशत तक कमाई वेतन-पेंशन और फ्री स्कीम में खर्च, विकास के लिए पैसा नहीं

दिल्ली। देश के कई राज्यों में मुफ्त योजनाओं और सब्सिडी के कारण वित्तीय संकट गहराता जा रहा है।

राजस्थान, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों की आय का अधिकांश हिस्सा वेतन, पेंशन, ब्याज और मुफ्त स्कीमों पर खर्च हो जाता है। इसके बाद विकास और बुनियादी ढांचे के लिए मात्र 20-25% या उससे भी कम राशि बचती है। उदाहरण के लिए, पंजाब के पास खर्च के लिए केवल 7% राशि बची है।

राजस्थान को इस बार ₹1.50 लाख करोड़ का कर्ज चुकाना है, जबकि यह पहले ही 32 हजार करोड़ का कर्ज ले चुका है। इसी तरह पंजाब को ₹90 हजार करोड़ मूलधन चुकाना है, जिसके लिए भारी कर्ज लेना पड़ रहा है। बिहार में चुनावी वादों की अदायगी राज्य के पूंजीगत व्यय का 25 गुना हो सकती है, जिससे दिवालियापन की आशंका है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी अधिकांश आय केवल वेतन, पेंशन और ब्याज अदायगी में जा रही है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और बंगाल में बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च सीमित है। बंगाल में कमाई का 21.2% हिस्सा ब्याज चुकाने में चला जाता है, जो शिक्षा-स्वास्थ्य बजट से अधिक है। महाराष्ट्र में 903 विकास परियोजनाएं रद्द कर दी गईं।

विशेषज्ञों का कहना है कि नए फ्रीबीज या सब्सिडी की घोषणा से पहले आय और संसाधनों का मूल्यांकन जरूरी है। पुरानी सरकार की योजनाओं को बंद न करना भी वित्तीय बोझ बढ़ाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 12 फरवरी 2025 को चुनाव के समय फ्रीबीज की आलोचना करते हुए कहा था कि इससे लोग मुख्यधारा से कट जाते हैं और परजीवियों की जमात बनती है।

राज्यों को वित्तीय स्थिरता के लिए खर्चों पर नियंत्रण, पुरानी योजनाओं का समायोजन और विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता देना आवश्यक है। केवल मुफ्त योजनाओं और सब्सिडी के भरोसे विकास की राह मुश्किल होती जा रही है।

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