जगदलपुर। बस्तर के जंगलों और दूरस्थ गांवों में कभी माओवादी वर्चस्व और भय के प्रतीक रहे माओवादी नेताओं के स्मारक अब इतिहास बनते जा रहे हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्च 2026 तक माओवाद उन्मूलन के लक्ष्य और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार की सख्त रणनीति के तहत सुरक्षा बलों द्वारा लगातार कार्रवाई की जा रही है। बीते एक वर्ष में बस्तर संभाग में 70 से अधिक माओवादी स्मारकों को ध्वस्त किया जा चुका है। शुक्रवार को बीजापुर के अंदरूनी इलाकों में ही छह ऐसे स्मारक गिराए गए।
अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई केवल ईंट-पत्थर तोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि माओवादियों की उस वैचारिक और मनोवैज्ञानिक पकड़ को तोड़ने का प्रयास है, जिसने वर्षों तक क्षेत्र में भय और दबदबा बनाए रखा था।
बस्तर के करीब 3900 गांवों में से एक समय लगभग 2800 गांव माओवादी प्रभाव में थे। सुरक्षा रिक्तता का फायदा उठाकर एक हजार से अधिक गांवों में माओवादी नेताओं के नाम पर स्मारक बनाए गए थे। अब अधिकांश गांवों में इन्हें हटाया जा चुका है और शेष स्थानों पर चरणबद्ध कार्रवाई जारी है।
इस अभियान का असर ग्रामीणों की सोच और जीवनशैली में भी स्पष्ट दिख रहा है। बीजापुर के एक गांव के सरपंच बताते हैं कि स्मारकों के रहते हमेशा डर का माहौल बना रहता था।
अब सुरक्षा बलों की मौजूदगी से भय खत्म हुआ है और स्कूल, राशन तथा स्वास्थ्य सेवाएं नियमित रूप से मिल रही हैं। वहीं, एक युवा ग्रामीण का कहना है कि पहले गांवों में नारे और पोस्टर दिखाई देते थे, अब सड़कें, कैंप और विकास कार्य नजर आते हैं, यही असली बदलाव है।
हाल के महीनों में शीर्ष माओवादी नेताओं के स्मारक भी निशाने पर रहे हैं। इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में भाकपा (माओवादी) प्रमुख बसव राजू का स्मारक, सालातोंग गांव में रमन्ना का विशाल स्मारक और भट्टीगुड़ा में कट्कम सुदर्शन का स्मारक ध्वस्त किया गया है।
सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि यह अभियान दीर्घकालिक शांति, विकास और पुनर्वास की दिशा में निर्णायक कदम है। भय के प्रतीकों के हटने से अब कानून का शासन मजबूत हो रहा है और बस्तर धीरे-धीरे विकास के पथ पर अग्रसर हो रहा है।
