शासन व्यवस्था देता है, जगाता है साहित्य संवेदना

रायपुर। रायपुर साहित्य उत्सव के तीसरे दिन ‘शासन और साहित्य’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने शासन और साहित्य के अंतर्संबंधों पर अपने विचार साझा किए।

लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित यह सत्र प्रख्यात छत्तीसगढ़ी साहित्यकार और पूर्व सांसद स्वर्गीय केयूर भूषण को समर्पित रहा। सत्र का संचालन रायपुर कलेक्टर डॉ. गौरव कुमार सिंह ने किया।

परिचर्चा में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि शासन और साहित्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। शासन जहां नीतियों और नियमों के माध्यम से समाज को व्यवस्था देता है, वहीं साहित्य मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखकर शासन को दिशा और आत्ममंथन का अवसर देता है।

डॉ. गौरव कुमार सिंह ने कहा कि साहित्य शासन के लिए दर्पण का काम करता है और रायपुर साहित्य उत्सव जैसे आयोजन यह साबित करते हैं कि प्रशासन साहित्य को गंभीरता से महत्व देता है।

वरिष्ठ साहित्यकार व सेवानिवृत्त आईएएस डॉ. सुशील त्रिवेदी ने कहा कि शासन का उद्देश्य स्वतंत्रता, समता और न्याय स्थापित करना है, जबकि साहित्य आमजन के संघर्ष और भावनाओं की आवाज बनता है। उन्होंने साहित्य को मनुष्य का “स्थायी लोकतंत्र” बताया।

सेवानिवृत्त आईएएस डॉ. संजय अलंग ने कहा कि दुनिया की कई बड़ी क्रांतियों की जड़ में साहित्य रहा है और शासन को दृष्टि साहित्य से ही मिलती है। वहीं डॉ. इंदिरा मिश्रा ने शासन की व्यावहारिक चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई बार कठोर निर्णय जरूरी हो जाते हैं।

सेवानिवृत्त आईएएस बी.के.एस. रे ने कहा कि वही प्रशासक सफल है, जो मनुष्यता को समझे। यदि शासन भटकता है, तो साहित्य का कर्तव्य है कि वह उसे सही राह दिखाए।

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