रायपुर। छत्तीसगढ़ के जंगलों में महुआ के फूलों की महक के साथ ही धुआं भी उठने लगा है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, प्रदेश के जंगल और पहाड़ दावानल (Forest Fire) की चपेट में आ रहे हैं।
यह आग प्राकृतिक नहीं, बल्कि इंसानी लालच और नासमझी का नतीजा है। बलरामपुर जिले के लमना चोटिया गांव के पास पहाड़ियों से आती तस्वीरें डराने वाली हैं, जहां बिलासपुर-अंबिकापुर मार्ग के किनारे का बड़ा हिस्सा आग की लपटों में झुलस रहा है।
क्यों लगाई जा रही है आग
छत्तीसगढ़ के वनांचलों में महुआ संग्रहण ग्रामीणों की आजीविका का बड़ा साधन है। पेड़ों के नीचे गिरी सूखी पत्तियां महुआ बीनने में बाधा बनती हैं। फूल साफ दिखाई दें और उन्हें आसानी से समेटा जा सके, इसके लिए ग्रामीण पेड़ों के नीचे की सूखी पत्तियों में आग लगा देते हैं। हवा के साथ यह छोटी सी आग विकराल रूप ले लेती है और पूरे जंगल को अपनी चपेट में ले लेती है।
आंकड़ों में तबाही का मंजर
वन विभाग और सैटेलाइट मॉनिटरिंग के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में हर साल गर्मियों (मार्च से मई) के दौरान हजारों ऐसी घटनाएं दर्ज होती हैं।
प्रदेश में हर साल औसतन 2000 से 2500 दावानल के मामले सामने आते हैं। इस साल अब तक प्रदेश के 205 स्थानों पर फायर अलर्ट जारी हो चुका है। बलरामपुर समेत पूरा सरगुजा संभाग और बस्तर के पहाड़ी इलाके इस आग से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
पर्यावरण और वन्यजीवों को भारी नुकसान
जंगल की यह आग न केवल बेशकीमती लकड़ियों और औषधीय पौधों को राख कर रही है, बल्कि जैव विविधता (Biodiversity) के लिए भी काल बन रही है।
जमीन पर रेंगने वाले छोटे जीव-जंतु, पक्षियों के अंडे और नवजात शावक इस आग में जलकर मर जाते हैं। धुएं के कारण आसपास के गांवों का वायु प्रदूषण स्तर भी खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है।
प्रशासन और वन विभाग लगातार जागरूकता अभियान चलाने का दावा करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हर साल महुआ का सीजन आते ही छत्तीसगढ़ की हरियाली काले धुएं में तब्दील होने लगती है।
