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महज यादों में रह गए सूबे के पहले मुखिया, सियासत के एक युग का अंत

  अर्धेन्दु मुखर्जी@खबर छत्तीसी छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी (ajit jogi) आखिरकर जिंदगी की जंग हार गए। उनका जाना न सिर्फ़ छत्तीसगढ़ की सियासत के लिए एक अपूरणीय क्षति है बल्कि देश की सियासत में भी वे अपना खास मुकाम रखते थे। अपने सियासी जीवन में तमाम उठा-पटक […]

हाईकोर्ट से अजीत जोगी को लगा बड़ा झटका, याचिका हुई खारिज

 

अर्धेन्दु मुखर्जी@खबर छत्तीसी

छत्तीसगढ़ महतारी के दुलरवा बेटा और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी (ajit jogi) आखिरकर जिंदगी की जंग हार गए। उनका जाना न सिर्फ़ छत्तीसगढ़ की सियासत के लिए एक अपूरणीय क्षति है बल्कि देश की सियासत में भी वे अपना खास मुकाम रखते थे।

अपने सियासी जीवन में तमाम उठा-पटक को लांघते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ की सियासत में एक नई इबारत लिखी..

एक ऐसी क्षेत्रीय पार्टी बनाई और पहली बार में ही

पांच सीटों पर कब्जा जमाकर यहां की सियासत को एक नई दिशा दी।

यह कोशिशें आगे बढ़ ही रही थी कि होनी को कुछ और ही मंजूर था।

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बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले अजीत जोगी (ajit jogi) में बचपन से ही वो जज्बा था,

लिहाजा वे पहले एक इंजीनियर थे (Engineer) फिर प्रशासनिक अधिकारी

और फिर राजनेता के तौर पर काम करते हुए छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने।

आज़ादी से एक साल पहले (central province) एवं बरार के

बिलासपुर के एक छोटे से गाँव मरवाही में इनका जन्म हुआ था।

लेकिन अपनी मेहनत और लगन से पहले इंजीनियरिंग (engineering) की पढ़ाई पूरी की

फिर कुछ दिन तक एनआईटी रायपुर में लेक्चरर (lecturer) के रूप में काम किया ।

इसके बाद आईपीएस बने और अगले ही साल फिर से परीक्षा दे कर आईएएस बन गए।

आईएएस बनने के बाद 1981-85 तक इंदोर जैसे महत्वपूर्ण जिले में कलेक्टर (collector) भी रहे ।

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अर्जुन सिंह की सुझाव से आए राजनीति में

उसी दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सुझाव से राजनीति में आए और कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए।

1986-1998 तक दो बार राज्य सभा के सदस्य रहे ।

इससे पूर्व एआईसीसी के अनुसूचित जाति – जनजाति विभाग का सदस्य भी बनाया गया था।

सोनिया गांधी के बेहद करीबी माने जाने वाले अजीत जोगी (ajit jogi) को

मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी में कई दिग्गजों के बावजूद महामंत्री भी बनाया गया था।

समय समय पर उनको कई राज्यों का चुनाव प्रभारी भी बनाया गया।

1996 में उन्हें महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी देते हुए एआईसीसी के कोर ग्रुप का सदस्य नियुक्त किया गया।

कई बड़े पदों पर रहे

सोनिया गांधी के करीबी होने की वजह से अजीत जोगी (ajit jogi) लगातार राजनीति के शिखर पर बढ़ते जा रहे थे।

1997 मे दिल्ली चुनाव होना था और उसी वक़्त उन्हें चुनाव का observer बनाया गया।

इसके बाद 1998 में बीजेपी के क़द्दावर नेता नंदकुमार साय को रायगढ़ लोक सभा में पटखनी दी।

इसके बाद उनका क़द दिन ब दिन और बढ़ता चला गया।

1998-2000 तक एआईसीसी के प्रवक्ता के रूप मे महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी को

बेहतरीन ढंग से निभाया साथ ही वो लगातार सोनिया गांधी के और क़रीब आते गए।

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जब छत्तीसगढ़ का पहला सीएम चुना जाना था

अजीत जोगी (ajit jogi) केन्द्रीय सियासत की बुलंदियों पर थे।

सोनिया गांधी के भरोसंद नेताओं में उनको शुमार किया जाता था।

इसका फ़ायदा उन्हें सबसे ज़्यादा उस वक़्त हुआ जब

मध्यप्रदेश से अलग हो कर छत्तीसगढ़ अलग राज्य के रूप मे अस्तित्व में आया।

विद्याचरन शुक्ला जैसे अनुभवी और बड़े नेताओं के लाख कोशिश के बावजूद अजीत जोगी (ajit jogi) छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री बन गए।

2000-2003 तक अजीत जोगी (ajit jogi) मुख्यमंत्री के पद पर बने रहे

लेकिन 2004 का चुनाव कांग्रेस और अजीत जोगी दोनों के लिए ही बुरी खबर के कर आया।

कांग्रेस चुनाव हार चुकी थी और अब छत्तीसगढ़ मे बीजेपी की सरकार थी।

रमन सिंह के नेतृत्व मे बीजेपी ने पंद्रह साल तक छत्तीसगढ़ में राज किया।

2004 में बने थे महासमुंद सांसद

अजीत जोगी (ajit jogi) एक बार फिर से 2004 में महासमुंद से लोकसभा चुनाव लड़े और जीत कर आए।

लेकिन अब विवाद उनके साथ साथ चलने लगा था।

इसी उठा-पटक में अजीत जोगी (ajit jogi) छत्तीसगढ़ की राजनीति में लगातार सक्रिय रहे।

2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से

अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए महासमुंद लोक सभासीट से मैदान में उतरे।

उनके ख़िलाफ़ बीजेपी से चंदूलाल साहू चुनावी मैदान में थे।

हर बार की तरह इस बार भी अपने चुनावी दाँव पेंच में माहिर जोगी जी

लगातार चुनाव में कड़ी मेहनत कर रहे थे।

इस चुनावी मैदान में ग्यारह और चंदूलाल साहू के नाम से प्रत्याशी मैदान में थे,

इसके बावजूद अजीत जोगी (ajit jogi) चुनाव हार गए।

सड़क हादसे के हो गए शिकार

साल 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान अजीत जोगी (ajit jogi) की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई और

वे चलने फिरने में असमर्थ हो गए।

उन्हें तब इलाज के लिए तत्काल मुम्बई ले जाया गया।

वे मौत के मुँह से वापस तो आ गए लेकिन फिर कभी अपने पैरों पर खड़े ना हो सके।