रायपुर। देश के गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने हाल ही में रायपुर में स्पष्ट कहा कि भूपेश बघेल के शासनकाल में छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने माओवादी आंदोलन को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिया। केंद्रीय गृह मंत्री के पास इस दावे के लिए ठोस तथ्य हैं, और उनकी टिप्पणियाँ निराधार नहीं मानी जा सकतीं।
विशेषकर झीरम में हुए भयावह नक्सली हमले का उदाहरण सामने आता है, जिसमें कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता शहीद हुए। इस हमले के बाद प्रदेश में कांग्रेस में आए नेतृत्व रिक्त स्थान का सबसे अधिक लाभ भूपेश बघेल को मिला, जिससे वे मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। भूपेश बघेल ने उस समय झीरम हमले के साक्ष्यों को सार्वजनिक नहीं किया और न ही जांच एजेंसियों को सौंपा, जबकि साक्ष्य छिपाना दंडनीय अपराध है।
कांग्रेस के अन्य नेताओं के बयान, जैसे राहुल गांधी का ‘झीरम हमले में नक्सलियों का हाथ नहीं’ कहना और राज्यसभा सदस्य रंजीता रंजन का ‘सभी नक्सली खराब नहीं’ कहना, सीधे तौर पर माओवादी समर्थक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। इसी तरह, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सुरक्षा बलों को वापस बुलाने का सुझाव दिया, जो संवेदनहीन और जोखिमपूर्ण माना गया।
कांकेर जिले में अप्रैल 2024 में सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए 29 माओवादियों की सफलता को भी पूर्व मुख्यमंत्री ने अवहेलना की। इसके अलावा, तेलंगाना और अन्य राज्यों में कांग्रेस नेताओं के नक्सली समर्थक बयान इसका प्रमाण हैं। ऐसे घटनाक्रम बताते हैं कि कांग्रेस शासन और उसके नेताओं ने बार-बार माओवादी आतंक को कमजोर करने के बजाय उसे अप्रत्यक्ष समर्थन दिया।
बस्तर में पीड़ित आदिवासियों और शहीद नेताओं के परिवारों के दृष्टिकोण से कांग्रेस के व्यवहार से उनके घाव और गहरे हुए। भूपेश बघेल की संवेदनहीनता और नक्सल समर्थक रुख ने दशकों तक क्षेत्र में आतंक और असुरक्षा का माहौल बनाए रखा।
आज, छत्तीसगढ़ की वर्तमान सरकार विकास और सुरक्षा के माध्यम से बस्तर में शांति और समृद्धि ला रही है। अब ‘बस्तर पंडूम’ और खेलों के माध्यम से सामाजिक जीवन पटरी पर लौट रहा है। पंकज झा ने कहा कि कांग्रेस का हाथ बस्तरियों के रक्त से रंगा रहा और उसे स्वीकारना चाहिए कि लोकतंत्र में हिंसा और आतंकवाद को कोई स्थान नहीं है। बस्तर का संदेश स्पष्ट है – अब विकास, सुरक्षा और लोकतंत्र ही प्रदेश का मार्गदर्शन करेंगे।
