रायपुर। ‘खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026’ के ट्रैक पर जब नासिक के सूरज माशी दौड़ रहे थे, तो उनके पैरों में चमकते स्पाइक्स उनके अपने नहीं थे। पालघर जिले के एक छोटे से गाँव से आने वाले इस 18 वर्षीय धावक ने अपने साथी खिलाड़ी से जूते उधार लेकर 5000 मीटर दौड़ में रजत पदक जीतकर साबित कर दिया कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।
खुद ही कोच, खुद ही शागिर्द
सूरज की कहानी आत्मनिर्भरता और अटूट संकल्प की है। एक दिहाड़ी मजदूर के बेटे सूरज नासिक में किराए पर रहकर पढ़ाई और ट्रेनिंग करते हैं। वे किसी प्रोफेशनल कोच की ₹4000 प्रति माह की फीस वहन नहीं कर सकते, इसलिए वे स्टेडियम में सीनियर खिलाड़ियों को देखकर खुद ही अपनी तकनीक निखारते हैं। ट्रेनिंग का खर्च निकालने के लिए वे हर महीने महाराष्ट्र और गुजरात की स्थानीय दौड़ों में हिस्सा लेते हैं और इनामी राशि से अपना कमरा किराया और घर का खर्च चलाते हैं।
पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ
वारली जनजाति से ताल्लुक रखने वाले सूरज के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारियां हैं। उनकी मां गंभीर चोट के कारण चल-फिर नहीं सकतीं और पिछले साल उन्होंने अपनी एक बड़ी बहन को खो दिया। अपने तीन छोटे भाइयों के लिए वे इकलौता सहारा हैं। स्थानीय प्रतियोगिताओं से होने वाली ₹3000 से ₹5000 की मासिक आय में से भी वे कुछ पैसे बचाकर अपने पिता को भेजते हैं।
खेल से रोजगार की उम्मीद
सूरज ने हाल ही में पुलिस भर्ती की कोशिश की थी, लेकिन शॉट पुट में कुछ फासले से चूक गए। हालांकि, खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में मिली इस सफलता ने उन्हें नई उम्मीद दी है। उन्हें भरोसा है कि पदक विजेता के रूप में मिलने वाली सरकारी प्रोत्साहन राशि और इस मंच की पहचान उनके जीवन का संघर्ष कम करेगी। सूरज की यह जीत उन हजारों जनजातीय युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अभावों के बीच अपने सपनों को हकीकत में बदलने का माद्दा रखते हैं।
